चंबा रुमाल की कढ़ाई बेमिसाल, अब युवतियों की ड्रेस में कमाल

चंबा रुमाल की कढ़ाई बेमिसाल, अब युवतियों की ड्रेस में कमाल
चंबा रुमाल की कढ़ाई बेमिसाल, अब युवतियों की ड्रेस में कमाल
हिमाचल बिजनेस। चंबा
अब चंबा रुमाल की लोककला सिर्फ ‘रुमाल’ तक सीमित नहीं रही है। ब्लाउज, ड्रेस, दुपट्टा, टेबल लिनेन, वाल-हैंगिंग के लिए चंबा रुमाल की कढ़ाई का प्रयोग हो रहा है। कई जगह तो दुल्हन के लिबास को चंबा रुमाल की कढ़ाई से सजाया जा रहा है।
चंबा रुमाल की कलाकार अनीता कुमारी ने अपनी फेसबुक वाल पर जो तस्वीरें अपलोड की हैं, उनमें युवा महिलाओं की पोशाकों पर चंबा रुमाल की कढ़ाई दिखाई है। ये लिबास उक्त महिलाओं की खूबसूरती में चार चाँद लगा रहा है। सनद रहे, 22 जनवरी 2007 को चंबा रुमाल को जीआई टैग मिला है।
राजघराने से निकली अनूठी कला
‘रुमाल’ शब्द सुनते ही आम तौर पर एक छोटा कपड़े का टुकड़ा याद आता है, मगर हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले की यह कला कुछ बहुत-अलग है। एक दौर ऐसी भी रहा है कि चंबा रुमाल केवल राजघराने के खास मेहमानों को ही भेंट दिया जाता था।
चंबा रुमाल दरअसल एक शानदार कढ़ाई वाला दो रूखे टांके वाला कलात्मक हस्तशिल्प है, जिसमें बारीक काम और चित्र कथा शैली देखने को मिलती है। यह शैली अपने आप में कपड़े पर चित्र जैसा अनुभव देती है, जहाँ धागों से चित्र रचे जाते हैं।
चंबा रुमाल की कला चंबा के राजाओ के संरक्षण में 17वीं शताब्दी से उभरती दिखती है। राजा उमेद सिंह (1748–68) ने मुग़ल-दर-कलाकारों को शरण दी और उनकी शैली ने चंबा रुमाल को नया आयाम दिया। शुरू में चंबा रुमाल की कला राजमहल तक सीमित थी।
चंबा रुमाल की कढ़ाई में मुख्यतः धार्मिक और पौराणिक कथाओं जैसे रामायण, महाभारत और कृष्ण-गोपी रासलीला, प्रकृति, पहाड़ी सामाजिक जीवन के दृश्य भी देखने को मिलते हैं। शाही संरक्षण खत्म होने के बाद इस कला में धीरे-धीरे गिरावट में आई। साल 1990 के बाद इसे पुनर्जीवित करने के प्रयास हुए।
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Jyoti maurya

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