क्यों नेरटी के इस मंदिर को हर साल चंबा से आते हैं 200 रुपए? शूरवीर राजा राज सिंह के बलिदान की याद में बना मंदिर

क्यों नेरटी के इस मंदिर को हर साल चंबा से आते हैं 200 रुपए? शूरवीर राजा राज सिंह के बलिदान की याद में बना मंदिर
क्यों नेरटी के इस मंदिर को हर साल चंबा से आते हैं 200 रुपए? शूरवीर राजा राज सिंह के बलिदान की याद में बना मंदिर
विनोद भावुक। नेरटी (शाहपुर)
कांगड़ा जिला के शाहपुर उपमंडल के तहत आता है धरोहर गांव नेरटी। यहीं पर चंबा के राजा राज सिंह कांगड़ा के महाराजा संसार चंद की सेना के साथ लड़ते- लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए थे। चंबा के शूरवीर राजा अढाई घड़ी तक बिना सिर के दुश्मनों से लड़ते रहे थे। उनकी यादगार के तौर पर एक देहरा और शिव मंदिर का निर्माण हुआ।
कभी यहां व्यापार मेला लगता था, अब भी यहां हर साल दो दिवसीय धार्मिक व सांस्कृतिक उत्सव आयोजित होता है। कभी इस आयोजन के लिए चंबा के लक्ष्मी नारायण मंदिर से 20 रुपए की आर्थिक मदद मिलती थी, अब यह राशि 200 रुपए हो गई है।
राज सिंह की बहादुरी के किस्से
चंबा के राजा राज सिंह ने वीरता और बलिदान की ऐसी गाथा लिखी गई, जिसे आज भी लोग श्रद्धा से याद करते हैं। 1755 में राजा उमेद सिंह के घर जन्मे राजकुमार राज सिंह बचपन से ही असाधारण साहस के धनी थे। मात्र 9 वर्ष की आयु में पिता का देहांत होने के बाद वे गद्दी पर बैठे और चंबा राज्य की बागडोर संभाली।
1794 में उनके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा आई। कांगड़ा नरेश संसर चंद ने अचानक चंबा पर आक्रमण कर दिया। उस समय राजा राज सिंह धार्मिक अनुष्ठान में लीन थे, लेकिन संकट की घड़ी में वे तलवार लेकर रणभूमि में उतर पड़े।
बेटे ने पिता की याद में बनवाया मंदिर
राजा राज सिंह ने करीब एक घंटे तक अकेले ही दुश्मनों से मोर्चा लिया। वीरता से लड़े, अनेक शत्रुओं को परास्त किया, लेकिन अंत में सिर पर लगी चोट घातक साबित हुई। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने अंतिम सांस तक युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए।
उनके बलिदान को अमर बनाने के लिए उनके पुत्र जीत सिंह ने देहरे दा मंदिर का निर्माण करवाया। तब से लेकर हर वर्ष उनकी शहादत दिवस पर मेला आयोजित होता है। शहीद राजा की याद में आयोजित यह परंपरा 1796 से निरंतर जारी है।
राजा की शहादत की गाथा
आज भी चंबा की जनता उन्हें निर्भीक राजा के रूप में याद करती है। पत्थर पर जमी रक्त की बूंदें आज भी उनकी शहादत की गाथा सुनाती हैं कि किस तरह एक राजा ने अपने प्राणों की आहुति देकर अपनी प्रजा और अपनी भूमि की रक्षा की।
राजा राज सिंह का साहस और बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। साहित्यकार दुर्गेश नन्दन बताते हैं कि यह मंदिर चंबा के एक समुदाय विशेष की आस्था का बड़ा केंद्र है।
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Jyoti maurya

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