एक तस्वीर, हज़ार कहानियां : ब्रिटिश शाही सैर की शान, श्रम और शोषण की दास्तान
एक तस्वीर, हज़ार कहानियां : ब्रिटिश शाही सैर की शान, श्रम और शोषण की दास्तान
विनोद भावुक / शिमला
1912 का साल, शिमला की पहाड़ियों पर धूप हल्की थी और हवा में यूरोपीय खुशबू घुली थी। सड़कों पर अंग्रेज़ी हैट पहने हाकिम और उनके पीछे झुके कंधों पर एक रिक्शा, जिसमें सवार थीं एक ब्रिटिश महिला। शायद किसी गवर्नर की पत्नी, जो शिमला के माल रोड की सैर पर निकली थीं।
यह हाथ से खींचा जाने वाला रिक्शा सिर्फ़ एक सवारी नहीं था, यह उस दौर की औपनिवेशिक समाज व्यवस्था की जीवित तस्वीर थी। शिमला की घुमावदार गलियों में बर्फीली हवाओं के बीच मानव शक्ति पर चलती यह यूरोपीय शानो-शौकत की गाड़ी, औपनिवेशिक असमानता की सबसे जीवंत झलक बन गई थी।
अंग्रेज़ मालिक, लोकल नौकर
ब्रिटिश राज में शिमला को समर केपिटल ऑफ इंडिया कहा जाता था। हर साल अप्रैल से अक्टूबर तक यहां वायसराय, उनके अधिकारी और परिवार के सदस्यों सहित ब्रिटिश प्रशासन स्थानांतरित हो जाता था। इस दौरान स्थानीय लोग, मुख्यतः पहाड़ी मजदूर, उनके लिए रिक्शा खींचने, नौकर, माली और बटलर के रूप में काम करते थे।
शाम को जब शिमला की माल रोड पर यूरोपीय महिलाएं घूमने निकलती थीं, तो उनके आगे-पीछे चलते ये रिक्शा खींचने वाले पुरुष, सिर्फ़ शरीर नहीं एक सभ्यता की असमान रेखा को भी खींच रहे होते थे।
रिक्शा : जापान से शिमला तक का सफर
क्या आप जानते हैं? हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा की शुरुआत 1869 में जापान से हुई थी। कुछ ही वर्षों में यह साधन सिंगापुर, चीन, हांगकांग और भारत तक पहुँच गया। भारत में इसे 1900 के दशक की शुरुआत में पेश किया गया।
जल्द ही यह कलकत्ता, बॉम्बे, मद्रास और शिमला जैसे शहरों में आम दृश्य बन गया। शिमला की ऊँचाइयों में, जहां घोड़ागाड़ी नहीं चल सकती थी, वहां ऐसा रिक्शा सबसे उपयुक्त सवारी थी। यह सस्ता था, सुलभ था और अंग्रेज़ों की जीवनशैली का प्रतीक बन गया।
पसीने के पहिए, मेहनतकशों की कहानी
शिमला में हाथ से खींचा जाने वाला रिक्शा 1910 से 1940 तक परिवहन का प्रमुख साधन रहा। इन रिक्शाओं को खींचते थे स्थानीय गोरखे, नेपाली और कांगड़ा-कीरतपुर के मजदूर। तीव्र ढलानों पर, बर्फ़ीली ठंड में, यूरोपीय महिलाओं और बच्चों को ढोते हुए वे अक्सर नंगे पांव, कंधों पर साम्राज्य की शानो-शौकत का बोझ उठाते थे।
यह तस्वीर केवल सिर्फ शाही सैर की नहीं है, बल्कि श्रम और शोषण की दास्तान भी है। आज शिमला की वही सड़के जहां कभी हाथ से रिक्शा चलते थे, अब टैक्सी और टूरिस्ट कारों से भरी हैं। पर अगर ध्यान से सुनो, तो अब भी हवा में वो हां…हां…चला दे भाई!’ की आवाज़ गूंजती है, जो उस दौर की मेहनत और मानवता की याद दिलाती है।
;मोहिनी ऑन अ स्विंग’ की झलक
उस दौर में राजा रवि वर्मा जैसे कलाकारों ने भारतीय कला में नए रंग भरे। 1930 की उनकी प्रसिद्ध पेंटिंग ‘मोहिनी ऑन अ स्विंग’ जिस स्त्री सौंदर्य और कोमलता का चित्रण है, वही भाव 1912 की इस तस्वीर में शिमला की अंग्रेज़ महिला के चेहरे पर झलकता है।
बस फर्क इतना कि एक चित्र ‘देवत्व’ का है, और दूसरा ‘औपनिवेशिक सत्ता’ का है। 1912 की यह तस्वीर आज सिर्फ़ इतिहास नहीं, बल्कि एक दर्पण है जो बताता है कि किसी का विकास अक्सर किसी और की मेहनत पर टिका होता है।
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