नयनों को आज भी परम सुख देती हैं 300 साल पहले बनाईं ‘नैनसुख’ की पहाड़ी पेंटिंग्स, जीवन और कला पर आधारित पुस्तक ‘नैनसुख’ को प्रथम पुरस्कार
नयनों को आज भी परम सुख देती हैं 300 साल पहले बनाईं ‘नैनसुख’ की पहाड़ी पेंटिंग्स, जीवन और कला पर आधारित पुस्तक ‘नैनसुख’ को प्रथम पुरस्कार
विनोद भावुक। धर्मशाला
आई सेक्ट पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित लेखक नर्मदा प्रसाद उपाध्याय की पुस्तक ‘नैनसुख’ को वर्ष 2025 में फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स की कॉफी-टेबल बुक श्रेणी में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नैनसुख ने 18वीं शताब्दी में गुलेर-कांगड़ा शैली (पहाड़ी चित्रकला) को एक नया आयाम दिया। उनकी जीवनी और कला पर आधारित यह कृति उत्कृष्ट प्रकाशन के रूप में उभरी है।
पुस्तक में लेखक ने देश-विदेश के संग्रहालयों, निजी कलाविदों के संग्रह और दुर्लभ चित्रों-लिपियों तक पहुँच बनाई है। स्वर्गीय जगदीश मित्तल ने अपने निजी संग्रह से चित्रों की छवियाँ उपलब्ध कराईं हैं और प्रख्यात कला-इतिहासकार पद्मश्री डॉ विजय शर्मा ने चित्रों पर अंकित टाकरी लिपि पढ़-समझ कर शोध को समृद्ध किया।
नैनसुख की कला विरासत
नैनसुख ने पारंपरिक पहाड़ी शैली को मुग़ल चित्रकला के तत्त्वों के साथ संयोजित किया, जिससे पहाड़ी चित्रकला में नया आयाम आया। उन्होंने बहुत-से चित्रों में राजा बालवंत सिंह के पत्र लेखन, शिकार, धूम्रपान जैसे निजी जीवन-दृश्यों को सहजता से चित्रित किया।
गुलेर-कांगड़ा चित्रकला की विशिष्टता प्राकृतिक वातावरण, हल्के रंगों, मानवीय भावों की सहज अभिव्यक्ति में है। नैनसुख का नाम और उनकी लघुचित्रों की सौन्दर्य-कला नयनों को परम सुख देने वाली है। लेखक नर्मदा प्रसाद उपाध्याय बताते हैं कि पहाड़ी चित्रकला के चाहवानों के लिए यह पुस्तक शानदार उपहार है।
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पेपरबैक में ऑनलाइन खरीदिए
प्रकाशन की सफलता में कई व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका उल्लेखनीय रही है। आईसेक्ट पब्लिकेशंस के संस्थापक संतोष चौबे की दूरदृष्टि और समर्पण, प्रकाशन प्रक्रिया में सुप्रसिद्ध कलाकार अशोक भौमिक का योगदान, रचना-संपादन में बिजेंद्र विज का नेतृत्व, प्रभारी के रूप में अर्जुन सिंह की सक्रियता और उत्कृष्ट प्रकाशन के प्रति सम्पूर्ण आईसेक्ट परिवार की प्रतिबद्धता रही है।
इस प्रकाशित कृति को कॉफी-टेबल बुक श्रेणी में प्रथम पुरस्कार मिलने का निर्णय, एक प्रकार से पहाड़ी कला को राष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर स्थापित करने वाला कदम है। साहित्यिक, कलात्मक और सांस्कृतिक रूप से यह एक अहम योगदान रहा है। यह कृति अब पेपरबैक रूप में भी ऑनलाइन (अमेज़ॉन) उपलब्ध है, जिससे कला-प्रेमियों तथा शोधकर्ताओं को आसानी से पहुँच होगी।
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