कपूरथला से आई शाही बारात का उपकार, पपरोला के हर व्यक्ति को चांदी का सिक्का उपहार

कपूरथला से आई शाही बारात का उपकार, पपरोला के हर व्यक्ति को चांदी का सिक्का उपहार
कपूरथला से आई शाही बारात का उपकार, पपरोला के हर व्यक्ति को चांदी का सिक्का उपहार
विनोद भावुक। धर्मशाला
साल था 1883, जब कपूरथला के महाराजा सर जगतजीत सिंह का रिश्ता तय हुआ कांगड़ा घाटी के पपरोला की राजकुमारी हरबंस कौर से, जो मियां रणजीत सिंह गुलरिया की बेटी थीं। लंबग्राम के महाराजा सर जयचंद कटोच ने शगुन की रस्म पूरी की। तीन साल बाद 1886 में ऐतिहासिक विवाह हुआ, जिसने पहाड़ों और पंजाब को एक मजबूत डोर में बांध दिया।
बारात की शान उस दौर की विलासिता को बयाँ करती थी। बारात में 4,494 शाही बाराती और 37 हाथी शामिल थे। मंडी के राजा अपने 1,600 फॉलोअर्स के संग पालमपुर में बारात में शामिल हुए। जैसलमेर के ठाकुर मनोहर सिंह ने शादी की विशेष रस्में निभाईं। पपरोला में हर स्त्री, पुरुष और बच्चे को एक-एक चांदी का सिक्का दिया गया, जिससे पूरा इलाका खुशियों झूम उठा।
पहाड़ी रियासतों में टीम और शादियाँ
पहाड़ी रानियां महाराजा सर जगतजीत सिंह की प्रेरणाएं रहीं। सीनियर महारानी हरबंस कौर के अलावा महाराजा जगतजीत सिंह की तीन और पत्नियाँ भी पहाड़ी रियासतों से थीं। उन्होंने 1891 में कांगड़ा की कटोच वंश से संबंध रखने वाली राजकुमारी से शादी की जो कपूरथला रियासत में महारानी पार्वती कौर के नाम से जानी गई।
अगले ही साल महाराजा ने 1892 में बुशहर रियासत की लक्ष्मी देवी से शादी की जो महारानी लक्ष्मी देवी के नाम से इतिहास के पन्नों में दर्ज है। तीन साल बाद 1895 में महाराजा में जुब्बल रियासत की राजकुमारी कनारी से शादी रचाई।
किताब में दर्ज इतिहास की शान
ब्रिगेडियर एच.एच. सुखजीत सिंह और सिंथिया मीरा फ्रेडरिक की किताब ‘Prince Patron and Patriarch – Maharaja Jagatjit Singh of Kapurthala में इस पूरी राजसी गाथा का विवरण मिलता है। यह पुस्तक उस दौर की संस्कृति, सौंदर्य और शाही रिश्तों का जीवंत दस्तावेज़ है।
कपूरथला के महाराजा जगतजीत सिंह ने अपनी जवानी की धूप-छाँव धर्मशाला, डलहौजी और शिमला की वादियों में बिताई। उनके रिश्तों ने जहां पंजाब की रियासतों को आपस में जोड़ा, बल्कि पहाड़ी रियासतों की शाही गरिमा को भी भारत के इतिहास में एक नई ऊँचाई दी।
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Jyoti maurya

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