इतिहास के पन्नों से : शिमला की टेबल पर तिब्बत का भविष्य, 1914 की वो संधि जिसे चीन ने ठुकरा दिया
इतिहास के पन्नों से : शिमला की टेबल पर तिब्बत का भविष्य, 1914 की वो संधि जिसे चीन ने ठुकरा दिया
हिमाचल बिजनेस, शिमला
साल था 1914 और जगह ब्रिटिश भारत की गर्मियों की राजधानी शिमला। यहां चल रही थी वो गुप्त बैठक, जिसने तिब्बत और चीन के इतिहास की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। ब्रिटेन चाहता था कि तिब्बत को चीन से अलग कर अपने प्रभाव में लिया जाए।
इस मकसद से बुलाई गई थी शिमला कोन्फ्रेंस, जहां तीन देश ब्रिटेन, चीन और तिब्बत आमने-सामने थे। 2 जुलाई 1914 को ब्रिटिश प्रतिनिधि ने चीन के दूत चेन यिफान को कहा कि अगर तुमने संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए तो चीन, तिब्बत में अपने सारे अधिकार खो देगा, लेकिन चीन झुका नहीं।
ब्रिटेन की धमकी के बावजूद चीन का इनकार
चेन यिफान ने साफ़ शब्दों में कहा कि हम इस समझौते को नहीं मानते। और तब, बिना चीन की सहमति के ब्रिटेन और तिब्बत ने मिलकर शिमला संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। यह संधि ब्रिटिश ‘मध्यस्थता’ के नाम पर तिब्बत की सीमाओं और भविष्य का फ़ैसला थी।
10 जुलाई 1914 को ब्रिटिश विदेश सचिव ग्रेगरी ग्रे ने चीन को आख़िरी धमकी दी कि अगर चीन ने दस्तखत नहीं कि तो इसके नतीजे चीन के लिए विनाशकारी होंगे, लेकिन इस धमकी के बाद भी चीन संधि पर राजी नहीं हुआ।
इतिहास की सबसे जटिल गुत्थियों में शामिल तिब्बत का सवाल
इस इनकार ने ब्रिटेन-चीन संबंधों में नई दरार डाल दी और तिब्बत का सवाल आज तक इतिहास की सबसे जटिल गुत्थियों में से एक बना हुआ है। 111 साल बीत जाने के बाद भी तिब्बत की आजादी का सपना अभी सपना ही बना हुआ है।
1914 की उस सर्द हवा में शिमला की उस मेज पर सिर्फ दस्तावेज़ ही नहीं बदले थे, बल्कि हिमालय की राजनीति की दिशा भी तय हो गई थी। आज भी निर्वासित तिब्बत की सरकार मैकलोडगंज से चल रही है और तिब्बती अपने वतन से दूर हैं।
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