ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर के स्केच में जीवंत कांगड़ा किला, 1847 में लंदन से छपी ब्रिगेडियर एलेक्ज़ेंडर जैक की पुस्तक

ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर के स्केच में जीवंत कांगड़ा किला, 1847 में लंदन से छपी ब्रिगेडियर एलेक्ज़ेंडर जैक की पुस्तक
ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर के स्केच में जीवंत कांगड़ा किला, 1847 में लंदन से छपी ब्रिगेडियर एलेक्ज़ेंडर जैक की पुस्तक
विनोद भावुक। धर्मशाला
कांगड़ा किला जहां इतिहास बोलता है। कांगड़ा का किला सिर्फ़ पत्थरों का ढेर नहीं है, यह इतिहास की सांसें हैं। यहां की हर दीवार, हर दरार एक कहानी कहती है। इन्हीं दीवारों पर 1846 में एक ब्रिटिश अफ़सर ब्रिगेडियर एलेक्ज़ेंडर जैक ने अपनी बहादुरी की ऐसी मिसाल छोड़ी, जिसकी गूंज स्कॉटलैंड तक पहुँची।
जैक सिर्फ़ सैनिक नहीं, एक संवेदनशील कलाकार भी थे। कांगड़ा के खूबसूरत दृश्यों और युद्ध के बीच की कठिनाइयों को उन्होंने अपने स्केच में उतारा। 1847 में लंदन से उनकी किताब छपी ‘Six Views of Kot Kangra and the Surrounding Country, जिसमें ब्यास नदी, गोल्डन टेंपल और कांगड़ा किला जैसे दृश्य आज भी ब्रिटिश म्यूज़ियम और भारतीय अभिलेखागार में सुरक्षित हैं।
पहली ब्रिटिश स्केचबुक में कांगड़ा
ब्रिगेडियर जैक अब इतिहास की किताबों में दर्ज हैं, पर कांगड़ा किला आज भी उनकी यादों से गूंजता है।
उनके बनाए स्केच हिमाचल की पहली ब्रिटिश स्केचबुक माने जाते हैं। कांगड़ा की पहाड़ियों पर चढ़ती तोपों का दृश्य, ब्यास नदी पार करती सेना, और कांगड़ा किला आज भी उनके चित्रों में जीवंत हैं।
एक स्कॉटिश अफ़सर ने कांगड़ा को इतिहास में अमर कर दिया। उसके बनाए स्केच आज भी यही कहते हैं कि पहाड़ सिर्फ़ युद्ध का मैदान नहीं, बल्कि आत्मा का आईना होते हैं। उनकी लिखी ‘Six Views of Kot Kangra and the Surrounding Country’ किताब हिमाचल के परिदृश्य का पहला ब्रिटिश विज़ुअल रिकॉर्ड मानी जाती है — एक सैनिक की नज़रों से देखे गए पहाड़ों की आत्मा।
द मार्च ऑफ कांगड़ा गन
1846 में जब पहला सिख युद्ध छिड़ा, ब्रिटिश सेना पंजाब से होते हुए कांगड़ा की ओर बढ़ी। पहाड़ों की ऊंचाई, तेज़ नदियां और दुर्गम रास्ते ब्रिटिश सैनिकों के लिए चुनौती थे, लेकिन ब्रिगेडियर जैक ने वो किया, जिसे असंभव कहा गया था। उन्हें आदेश मिला था कि 18-पाउंडर तोपें पीछे छोड़ दो।
जैक ने जवाब दिया कांगड़ा की जीत इन तोपों के बिना अधूरी होगी। दिन-रात उन्होंने अपने सिपाहियों के साथ तोपें पहाड़ों पर चढ़ाईं। यह मिशन ‘The March of Kangra Guns’ के नाम से इतिहास में दर्ज हुआ, जिसे ब्रिटिश सेना ने बंगाल आर्टिलरी का स्वर्ण अध्याय कहा गया।
ऑर्डर ऑफ द बाथ सम्मान
19 अक्टूबर 1805 को स्कॉटलैंड के एबरडीन में जन्मे एलेक्ज़ेंडर जैक एक विद्वान परिवार से थे। गणित और दर्शन के विद्यार्थी रहे जैक की मंज़िल किताबों में नहीं, तोपों की गड़गड़ाहट और तलवारों की टंकार में थी। 1823 में उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती ली और जल्द ही भारत पहुंच गए।
जैक ने दूसरे सिख युद्ध में भी अपनी बहादुरी दिखाई। चिल्लियांवाला और गुजरात की लड़ाइयों में उन्होंने कमान संभाली। युद्ध के मैदान में उनकी दिलेरी और बहादुरी के लिए ब्रिटिश साम्राज्य ने उन्हें Order of the Bath जैसे उच्च सैन्य सम्मान से नवाज़ा।
कांगड़ा की जीत का हीरो, गंगा की लहरों में समा गया
इतिहास में बहादुरी का इनाम हमेशा अमन नहीं होता। 1857 में जब भारत में आज़ादी की चिंगारी फूटी, जैक को कांवपुर भेजा गया, जहां किस्मत ने उनका आख़िरी इम्तिहान लिया। 27 जून 1857 की सुबह।
ब्रिगेडियर जैक और उनके सैकड़ों अंग्रेज़ सिपाही गंगा के किनारे नावों में सवार हुए।
नाना साहिब के साथ समझौता हुआ था कि वे इलाहाबाद सुरक्षित जा सकेंगे, लेकिन जैसे ही नावें चलीं, गोलियों की बौछार शुरू हो गई। हर नाव लहूलुहान हो गई। ब्रिगेडियर जैक गिर पड़े। कांगड़ा को जीतने वाला हीरो गंगा की लहरों में समा गया।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/from-the-pages-of-history-tibets-future-on-the-table-in-shimla-the-1914-treaty-that-china-rejected/

Jyoti maurya

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *