दस साल तक सुर्खियों बटोरता रहा पालमपुर का अंतरराष्ट्रीय चाय मेला, आते थे कश्मीर, लद्दाख, यारकंद और कशगर के व्यापारी, धौलाधार की गोद में दबी एक ब्रिटिश कहानी

दस साल तक सुर्खियों बटोरता रहा पालमपुर का अंतरराष्ट्रीय चाय मेला, आते थे कश्मीर, लद्दाख, यारकंद और कशगर के व्यापारी, धौलाधार की गोद में दबी एक ब्रिटिश कहानी
दस साल तक सुर्खियों बटोरता रहा पालमपुर का अंतरराष्ट्रीय चाय मेला, आते थे कश्मीर, लद्दाख, यारकंद और कशगर के व्यापारी, धौलाधार की गोद में दबी एक ब्रिटिश कहानी
विनोद भावुक। पालमपुर
आज हम ‘कांगड़ा चाय’ को उसकी खुशबू, स्वाद और अंतरराष्ट्रीय पहचान के लिए जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ‘कांगड़ा चाय’ की कहानी राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से भरी हुई है। ब्रिटेन, रूस, चीन और मध्य एशिया तक फैले ‘ग्रेट गेम’ की इस कहानी में ‘कांगड़ा चाय’ की पत्तियों और उसके केंद्र में छिपे पालमपुर की खास भूमिका रही।
‘हाई टी इन सेंट्रल एशिया: पालमपुर फेयर एंड कांगड़ा टी एंटरप्राइज’ में एरिक मोरन लिखते हैं कि कांगड़ा चाय की नींव केवल बागानों से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति, व्यापार और पर टिकी थी। आज कांगड़ा चाय जीआई टैग के साथ दुनिया में पहचान बना रही है, तब यह कहानी याद दिलाती है कि हिमालय की गोद में कभी चाय सिर्फ उगाई नहीं गई, बल्कि इतिहास लिखा गया था।
अंग्रेजों का मिली ‘हरे सोने की खान’
1849 में पंजाब जीतने के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिमालय की पहाड़ियों में नई संभावनाएँ तलाशनी शुरू कीं। तभी सामने आई कांगड़ा घाटी। धौलाधार के आँचल में बसी ऐसी घाटी जहां मौसम, मिट्टी और ऊंचाई, सब कुछ चाय के लिए परफेक्ट था। अंग्रेज़ों ने इस घाटी की विशेषताओं को देखते हुये चाय के उत्पादन के लिए चुना।
ब्रिटिश अधिकारी सर थॉमस डगलस फॉर्साइथ ने इस चाय मिशन को आगे बढ़ाया। वे किसानों और अंग्रेज़ उद्यमियों को इतने उत्साह से प्रेरित करते थे कि लगभग हर अंग्रेज़ अधिकारी कांगड़ा में चाय बागान लगाना चाहता था। कई ब्रिटिश कांगड़ा में चाय की खेती के लिए आगे आए और देखते ही देखते घाटी में चाय बागान फलने- फूलने लगे।
पालमपुर में अंतरराष्ट्रीय चाय मेला
1867 में फॉर्साइथ ने एक नई योजना बनाई। अगर कांगड़ा की चाय मध्य एशिया तक भेजनी है, तो पालमपुर में एक बड़ा मेला आयोजित किया जाए। कांगड़ा घाटी में पहली बार सुना गया कि हिमालय की पहाड़ियों में विदेशी व्यापारी आएंगे, चाय खरीदेंगे और कश्मीर, लद्दाख, यारकंद होते हुए कशगर (चीन के पश्चिमी प्रांत) के बाज़ारों में बेचेंगे।
ब्रिटिश अधिकारियों ने सोचा कि यह सिर्फ व्यापार नहीं, सामरिक बढ़त भी देगा। इस तरह 1867 में पालमपुर फेयर शुरू हुआ। पहले ही साल इतनी भीड़ उमड़ी कि इसे हिमालय का अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र कहा गया। मेले की सफलता पर अंग्रेज बहुत खुश हुये। अगले एक दशक तक पालमपुर का ट्रेड फेयर इंटरनेशल लेबल पर चर्चा में रहा।
कंधों पर लादकर चीन पहुंचा दी कांगड़ा चाय
इस कहानी का सबसे रोमांचक किरदार था रॉबर्ट शॉ, जो धर्मशाला के खनियारा का चाय बागान मालिक था। उसने चाय कारोबार को बढ़ाने के बहाने अकेले पहाड़ों को लांघकर, दुर्गम रास्तों से गुजरकर कशगर पहुंचकर पहली बार ब्रिटिश–मध्य एशिया कूटनीतिक रिश्ता स्थापित किया। इसके साथ ब्रिटेन और मध्य एशिया के बीच नए सम्बन्धों की शुरुआत हुई।
रॉबर्ट शॉ इतना जुनूनी था कि वह कांगड़ा चाय की पत्तियां और ब्रिटिश सामान अपने कंधों पर लादकर ले गया। उसकी यह यात्रा जोखिम और रोमांच से भरी हुई थी। रॉबर्ट शॉ कारगर तक पहुँचने के अपने मिशन में कामयाब रहा। बेहद दुर्गम रस्तों से होकर गुजरने वाली उसकी यात्रा बाद में ‘ग्रेट गेम’ की सबसे जोखिम भरी यात्रा कही गई।
इसलिए ढह गया पालमपुर का व्यापार मेला
पालमपुर में शुरू हुये व्यापार मेले की कई साल धमाकेदार सफलता रही, लेकिन फिर सब उलट गया।
चीन ने 1877 में कशगर पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया, जिसके चलते व्यापारिक रास्ते बंद हो गए और व्यापार खत्म हो गया। रूस ने मध्य एशिया पर कब्ज़ा कर ब्रिटेन को रोक दिया और ‘ग्रेट गेम’ कूटनीति पलट गई।
यारकंदी व्यापारियों ने पलायन किया, जिसके चलते कांगड़ा चाय के खरीदार ही नहीं बचे। इसी बीच ब्रिटिश सरकार ने चाय बागानों को दी जाने वाली मदद भी रोक दी, जिस कारण उद्योग कमजोर हो गया। जिस मेले से ब्रिटिश साम्राज्य मध्य एशिया में छाप छोड़ना चाहता था,एक दशक के सफर में वह एक साधारण स्थानीय आयोजन बनकर रह गया।
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Jyoti maurya

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