गद्दण बन हिमाचल प्रदेश के कई जोतों पर ‘धण’ चराती रही स्कॉटलैंड की क्रिस्टीना

गद्दण बन हिमाचल प्रदेश के कई जोतों पर ‘धण’ चराती रही स्कॉटलैंड की क्रिस्टीना
गद्दण बन हिमाचल प्रदेश के कई जोतों पर ‘धण’ चराती रही स्कॉटलैंड की क्रिस्टीना
विनोद भावुक। धर्मशाला
स्कॉटलैंड क्रिस्टीना नोबल साल 1967 में स्कॉटलैंड से ड्राइव करते हुए कांगड़ा पहुंची थी। धौलाधार पर्वतमाला की तलहटी में उन्होंने पहली बार गद्दी चरवाहों को देखा था। सफ़ेद भेड़-बकरियों का झुंड, सफेद ऊनी चोग़ा और कमर पर काली रस्सी बांधे हुक्का गुड़गुड़ाते गद्दी देखकर उन्हें ऐसा लगा, जैसे बाइबिल का कोई चित्र जीवित हो उठा हो।
गद्दियों के जीवन को करीब से जानने के लिए क्रिस्टीना गद्दण बन कर हिमाचल प्रदेश के कई जोतों पर गद्दियों के साथ ‘धण’ चराती रही। क्रिस्टीना ने गद्दियों का जीवन उनके पूरे वार्षिक प्रवास चक्र के साथ जिया। इस प्रवास के दौरान वे जालसू पास, साच पास, कुगती पास और रोहतांग पास जैसे ऊँचे दर्रों पर कुदरत के करीब रहीं।
किताब में ढाल दिया गद्दियों का जीवन
1967 से 1990 तक भारत में रहीं क्रिस्टीना को अनुभवों ने दो अहम किताबें लिखने के लिए प्रेरित किया। उनकी पुस्तक’ ओवर द हाई पासेज’ गद्दियों के साथ बिताए पूरे एक पूरे वर्ष का दस्तावेज़ है।
यह पुस्तक गद्दी संस्कृति, उनके संघर्ष और प्रकृति संग उनके सहअस्तित्व की जीवित विरासत है।
उनकी यह किताब गद्दी जीवन में गहरे झाँकने का अवसर देती है।
उनकी दूसरी पुस्तक एट इन द हिमालयाज’ बीस वर्षों में कुल्लू और खुद क्रिस्टीना में आए बदलावों की कथा है। क्रिस्टीना लिखती हैं कि पहाड़ों का पैमाना इतना विशाल है कि इंसान नगण्य लगता है, लेकिन पहाड़ियों पर उकेरे सीढ़ीनुमा खेत सदियों की मेहनत का परिणाम है। छोटे-छोटे खेत, जहां लोग गेहूं, जौ, चावल, दालें और आलू उगाते हैं, उन पर पूरा जीवन टिका है।
कैमरे में कैद किया गद्दियों का सफर
हिमालय में अपने पहले ट्रेक के दौरान कालीहिंद पास पर उन्हें बर्फ़ में फँसा एक मेमना दिखाई दिया। क्रिस्टीना और उनके साथियों ने उसे बर्फ़ से निकाला और गोद में लेकर नीचे उतरे। कुछ देर बाद एक गद्दी चरवाहा दिखाई दिया, जो दर्रा पार कर चुका था। कैंप पहुँचकर उसे पता चला कि झुंड से एक मेमना गायब है। वह हैरान था कि विदेशी महिला ने उसके मेमने को बचाया।
करीब 13,200 फीट की ऊँचाई पर स्थित रोहतांग दर्रा। नीचे लाहौल, पीछे कुल्लू। बर्फ़ीली हवा, पत्थरीली धार और उनके बीच भेड़ों और बकरियों का झुंड, जिसे हांकते गद्दी चरवाहे। यह दृश्य 1980 का है। इसे कैमरे में कैद किया, जो उनकी स्मृतियों में हमेशा- हमेशा के लिए
बस गया। उन्होंने गद्दियों के ऐसे कई दुर्लभ फोटो खींचेहैं।
गद्दन की ‘धर्म बहन’ क्रिस्टीना
क्रिस्टीना लिखती है इस दौरान एक परिचित गद्दी चरवाहा उसे अपने घर ले गया। गद्दियों में मितरी की रीत निभाई जाती है। गद्दी ने ज़िद की कि उसकी पत्नी क्रिस्टीना की धर्म-बहन” बने। फिर क्या था? घी और गुड़ की तीन-तीन बूँदें, माथे पर टीका, एक-दूसरे के चरण स्पर्श, दाएँ-बाएँ आलिंगन और एक अनोखा रिश्ता बन गया।
इस गद्दी परिवार से बाद में क्रिस्टीना भले ही मुलाक़ात कम हुई, लेकिन दोस्ती की महक बरकरार रही।
दोनों तरफ से उपहारों का सिलसिला चलता रहा। उसकी गद्दन उसे घी और गहने भेजती रही, क्रिस्टीना अपनी धर्म बहन को भेजती रहीं चाय और रंगीन रूमाल। क्रिस्टीना की कहानी अभी तक कई गद्दियों को याद है।
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Jyoti maurya

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