चित्रों में ढाल दिए राजाओं की ज़िंदगी के पल, भक्ति की भावना और दरबार की हलचल, चित्रों से इतिहास लिखने वाले कांगड़ा कलम के बिरले और गुनाम पेंटर पुरखू

चित्रों में ढाल दिए राजाओं की ज़िंदगी के पल, भक्ति की भावना और दरबार की हलचल, चित्रों से इतिहास लिखने वाले कांगड़ा कलम के बिरले और गुनाम पेंटर पुरखू
चित्रों में ढाल दिए राजाओं की ज़िंदगी के पल, भक्ति की भावना और दरबार की हलचल, चित्रों से इतिहास लिखने वाले कांगड़ा कलम के बिरले और गुनाम पेंटर पुरखू
विनोद भावुक। धर्मशाला
जिस दौर में न कैमरे थे, न जब इतिहास लिखने के साधन थे, उसी दौर में कांगड़ा की पहाड़ियों में एक चित्रकार रंगों और रेखाओं से राजाओं की ज़िंदगी, राज दरबार की हलचल और भक्ति की भावना को दर्ज कर रहा था। इस चित्रकार का नाम था पुरखू। वे 1780 से 1820 के बीच कांगड़ा शैली के एक प्रमुख पहाड़ी चित्रकार थे। उन्हें इतिहास में पुरखू ऑफ कांगड़ा के नाम से जाना जाता है।
पुरखू केवल चित्रकार नहीं थे, व अपने समय के दस्तावेज़कार भी थे। रंगों के जरिये इतिहास लिखने वाले इस पेंटर को कांगड़ा रियासत के महाराजा संसार चंद और लाहौर राज्य के महाराजा रणजीत सिंह का संरक्षण मिला। माना जाता है कि पुरखू महाराजा संसार चंद के दरबार में मुख्य चित्रकार थे। हालांकि कांगड़ा पेंटिंग को लेकर लिखी गई पुस्तकों और मीडिया में पुरखू पर कम ही चर्चा हुई है।
घटना की रिपोर्ट की तरह लगते चित्र
पुरखू की चित्रकारी की खास बात यह थी कि वे राजा के सार्वजनिक जीवन के साथ-साथ निजी जीवन को भी चित्रों में उतारते थे। उनकी भक्ति और दरबार दोनों में समान पकड़ थी। पुरखू ने हरिवंश, शिव पुराण, रामायण, गीता गोविंद और केदारा कल्प जैसे धार्मिक ग्रंथों पर आधारित चित्र भी बनाए। यानी उनके रंगों में दरबार की चमक भी थी और भक्ति की गहराई भी।
जहां पहले के पहाड़ी चित्रकारों की कला स्वप्निल और काव्यात्मक मानी जाती है, वहीं पुरखू की शैली को इतिहासकार पत्रकारीय कहते हैं। उनके रचे चेहरे पहली नज़र में समान लगते हैं, लेकिन ध्यान से देखें तो सूक्ष्म अंतर साफ दिखता है। उनके चित्र किसी कहानी की तरह नहीं, बल्कि घटना की रिपोर्ट की तरह लगते हैं।
चित्रकार नहीं, अपने समय के पत्रकार
पुरखू के प्रमुख शिष्य थे बशारत उल्लाह, जिन्होंने आगे चलकर इस शैली को आगे बढ़ाया। 1864 की लाहौर प्रदर्शनी में पुरखू की पेंटिंग्स प्रदर्शित की गईं। जूरी रिपोर्ट में उनकी कला की सराहना करते हुए कहा गया कि रंगों की स्पष्टता और ब्रश की कोमलता अद्भुत है। यह कांगड़ा चित्रकला के लिए खास सम्मान जैसा था।
कांगड़ा की सांस्कृतिक विरासत आज जब कांगड़ा पेंटिंग की बात होती है, तो पुरखू का नाम बिना बोले इतिहास अधूरा लगता है। वे उस दौर के कलाकार थे, कैनवास कांगड़ा कलम की खास पहचान थी। पुरखू सिर्फ एक चित्रकार नहीं थे, वे अपने समय के पत्रकार थे। कांगड़ा सिर्फ पहाड़ों की भूमि नहीं, कला और संवेदना की धरती भी है, उनकी पेंटिंग्स में साफ पढ़ा जा सकता है।
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Jyoti maurya

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