हमीरपुर के एनआईटी ने जब दिल तोड़ा, शिमला के ‘कर्ज़न कॉटेज’ ने टूटे मन को जोड़ा

हमीरपुर के एनआईटी ने जब दिल तोड़ा, शिमला के ‘कर्ज़न कॉटेज’ ने टूटे मन को जोड़ा
हमीरपुर के एनआईटी ने जब दिल तोड़ा, शिमला के ‘कर्ज़न कॉटेज’ ने टूटे मन को जोड़ा
विनोद भावुक। शिमला
कभी-कभी ज़िंदगी इंसान से उसकी पहचान छीन लेती है। नौकरी, पद और नाम, सब अचानक पीछे छूट जाता है, लेकिन ऐसे ही अंधेरे दौर में कुछ जगहें, कुछ शहर, और कुछ घर इंसान को फिर से जोड़ देते हैं। प्रो. सरोज ठाकुर के जीवन में शिमला का कर्ज़न कॉटेज ऐसी ही एक जगह बनीं, जहाँ हार के बाद उनके जीवन में उम्मीद ने दस्तक दी।
साल 2009 एनआईटी हमीरपुर से असमय विदाई। एक शिक्षक न रहने से जैसे पहचान भी छिन गई।
‘सिस्टम’ ने तोड़ना चाहा, लेकिन नियति ने उन्हें शिमला का रास्ता खोल दिया। महज एक हफ्ते के भीतर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ में फ़ेलोशिप मिली। पहली बार जीवन में अपने नाम से आवंटित घर, राजकालीन फर्नीचर और कर्ज़न कॉटेज का ग्राउंड फ़्लोर मिला।
भूखी आत्मा को अचानक मिला भोज
वर्ल्डप्रेसडॉटकॉम पर लिखे एक ब्लॉग में प्रो. सरोज ठाकुर कहती हैं, यह सिर्फ़ मकान नहीं था, यह मन और आत्मा की आज़ादी थी। विशाल लाइब्रेरी में किताबें सिर्फ़ पढ़ने की चीज़ नहीं, टूटे आत्मविश्वास की मरहम बन गईं। हर सुबह टेबल पर पड़ी किताबें, विविध विषय, और पढ़ते-पढ़ते समय का थम जाना, जैसे वर्षों से भूखी आत्मा को अचानक भोज मिल गया हो।
प्रो. सरोज ठाकुर लिखती हैं, शिमला की बारिश, जैसे जीवन के संघर्षों की प्रतिछाया। घनघोर अंधेरा, फिर अचानक धुली-धुली चमकती सड़कें। यही तो जीवन था, तूफान के बाद शांति। कर्ज़न कॉटेज में बैठकर राजकालीन अफ़सरों की कल्पनाएँ, वायसरॉय के दौर की गूँज, और यह एहसास कि इस दुनिया में केवल परिवर्तन ही स्थायी है।
शहर नहीं, उपचार हुआ शिमला
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ के साप्ताहिक सेमिनार, फिर हाई टी, जहाँ नए फ़ेलोज़ का परिचय होता, लेकिन उस समय सवाल डराता था आप क्या करते हैं? क्या इंसान की पहचान सिर्फ़ नौकरी है? और अगर नौकरी नहीं, तो क्या पहचान भी नहीं? इन सवालों से बचते हुए वह लौट आतीं अपने सुरक्षित आश्रय, कर्ज़न कॉटेज।
धीरे-धीरे बारिश के बाद धूप निकली। ठीक वैसे ही जैसे जीवन में। प्रो. सरोज ठाकुर के लिए शिमला सिर्फ़ एक शहर नहीं रहा, बल्कि उपचार, आशा और पुनर्जन्म बन गया। उस रोशनी का इंतज़ार कर रही थी, जो तूफान के बाद आती है और वह रोशनी उन्हें शिमला ने दी।
शिमला की हवाओं में सृजन की खुशबू
17 अगस्त 2025 को संवेदना और स्मृतियों को शब्दों में पिरोने वाली प्रख्यात शिक्षाविद् एवं लेखिका प्रोफेसर सरोज ठाकुर सदा के लिए दुनिया से चली गईं, पर उनके पुराने ब्लॉग, संस्मरण और लेख शिमला के इतिहास, समाज और मानवीय रिश्तों का दस्तावेज़ है।
सरोज ठाकुर का जाना शिमला की स्मृतियों, शब्दों की गरिमा और संवेदनशील लेखन की दुनिया के लिए
एक अपूरणीय क्षति है। उनकी लेखनी, उनकी यादें और उनके रचे हुए शब्द हमेशा जीवित रहेंगे। शिमला की हवाओं में उनके सृजन की खुशबू मौजूद रहेगी।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/robert-barclay-shaw-the-quiet-london-boy-who-lived-in-a-hospice-became-the-most-courageous-player-of-the-great-game/

Jyoti maurya

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *