75 दिन में 1500 किलोमीटर की दौड़, 40 पहाड़ी दर्रे किए पार, बेल्जियम के पीटर वान गीट की अल्ट्रा रनिंग का गवाह बना हिमाचल प्रदेश

75 दिन में 1500 किलोमीटर की दौड़, 40 पहाड़ी दर्रे किए पार, बेल्जियम के पीटर वान गीट की अल्ट्रा रनिंग का गवाह बना हिमाचल प्रदेश
75 दिन में 1500 किलोमीटर की दौड़, 40 पहाड़ी दर्रे किए पार, बेल्जियम के पीटर वान गीट की अल्ट्रा रनिंग का गवाह बना हिमाचल प्रदेश
विनोद भावुक। धर्मशाला
हिमाचल प्रदेश की दुर्गम घाटियाँ, बर्फ़ से ढके पहाड़ी दर्रे और अनछुए रास्ते, इन सबको करीब से देखने और महसूस करने का साहस बहुत कम लोग कर पाते हैं। ऐसे ही साहसी लोगों में एक हैं पीटर वान गीट। एक विदेशी धावक जिन्होंने हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों को सिर्फ़ देखा नहीं, बल्कि पांगी, चंबा, किन्नौर, स्पीति, रोहतांग, कोकसर और पिन-पार्वती जैसे इलाकों को दौड़कर पार किया।
बेल्जियम मूल के पीटर वान गीट वर्षों से भारत के चेन्नई में रहते हैं और हिमाचल प्रदेश से उनका गहरा नाता है। साल 2018 में पीटर वान गीट ने एक ऐसा कारनामा किया, जिसे आज भी अल्ट्रा-रनिंग और एडवेंचर की दुनिया में मिसाल माना जाता है। उन्होंने 75 दिनों में करीब 1500 किलोमीटर की दूरी तय की और इस दौरान 40 ऊंचे पहाड़ी दर्रे पार किए।
एक बोर्ड से शुरू हुई कहानी
पीटर को इस असाधारण यात्रा की प्रेरणा रोहतांग पास से आगे कोकसर के पास लगे हिमाचल टूरिज़्म के एक बोर्ड से मिली, जिसमें कई पहाड़ी दर्रों के नाम दर्ज थे। खास बात यह रही कि यह दौड़ उन्होंने सोलो तय की, बिना किसी गाइड, बिना किसी सपोर्ट टीम के। पीटर पहले भी हिमाचल में सड़क पर दौड़ चुके थे, लेकिन उस बोर्ड ने उन्हें पहाड़ों के अंदर झांकने के लिए मजबूर कर दिया।
इस पूरी यात्रा की योजना बनाने में पीटर को सबसे ज़्यादा मदद मिली बेंगलुरु के ट्रेकर सत्यनारायण (सत्या) के ब्लॉग से। सत्या हिमालय के उन दुर्लभ भारतीय ट्रेकर्स में थे, जो सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शों, जीपीएस लॉग्स और सैटेलाइट इमेज की मदद से दर्रों, कैंप साइट्स और ट्रेल्स की बेहद सटीक डॉक्यूमेंटेशन करते थे।
तेज़ बारिश, ठंड और अकेलेपन से मुक़ाबला
पीटर ने कभी सत्या से मुलाकात नहीं की, लेकिन ई-मेल और फोन पर हुई बातचीत ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। दुर्भाग्यवश, 2018 में सत्या हिमालय में एक सोलो ट्रेक के दौरान लापता हो गए।
पीटर की 75 दिन में 1500 किलोमीटर की दौड़ और 40 पहाड़ी दर्रे पार करने की यात्रा कहीं न कहीं सत्या को श्रद्धांजलि थी।
इस रन के दौरान पीटर को भूस्खलन बदले रास्ते, ग्लेशियरों की दरारें, तेज़ बारिश, ठंड और अकेलेपन से जूझना पड़ा। शुरुआत में कई साथी साथ आए, लेकिन ऊँचाई, ठंड और मानसिक दबाव के कारण पीछे हट गए। पीटर के लिए “अकेले रहना डरावना था, लेकिन एक बार लय बन गई तो आज़ादी महसूस हुई।
अकेले चलने से उन्हें अपनी रफ़्तार और फैसले खुद लेने अवसर मिला।
75 दिन की यात्रा, 5 किलो का बैग
पूरी 75 दिन की यात्रा में पीटर का बैग सिर्फ़ 5 किलो का था, जिसमें टेंट, ज़रूरी कपड़े, खाना जीपीएस और और नक्शे थे। उनका रोज़ का खर्च करीब 200 रुपये था। वे बसों से सफ़र करते, कभी टेंट में, कभी किसी स्थानीय के घर रुकते। जहाँ लोग नहीं जाते, वहाँ तक अपने रास्ते खुद बनाने के लिए उन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों में सफर किया।
पीटर कभी सिस्को जैसी बड़ी आईटी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर थे। 46 साल की उम्र में उन्होंने नौकरी छोड़ी। उनका मानना है कि ज़िंदगी सिर्फ़ पैसे कमाने और ट्रैफिक में फँसने के लिए नहीं है। असल जीवन उन जगहों में है, जहाँ हर सुबह नई होती है। पीटर आने वाले वर्षों में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और लद्दाख में100 से अधिक दर्रे पार करने की योजना बना रहे हैं।
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Jyoti maurya

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