मनाली आए और बिना पूंछ वाले नन्हें परिंदे से नहीं मिले तो आना बेकार, हिमालय की झाड़ियों में मस्त रहने वाला ‘स्केली-ब्रेस्टेड कपविंग’

मनाली आए और बिना पूंछ वाले नन्हें परिंदे से नहीं मिले तो आना बेकार, हिमालय की झाड़ियों में मस्त रहने वाला ‘स्केली-ब्रेस्टेड कपविंग’
मनाली आए और बिना पूंछ वाले नन्हें परिंदे से नहीं मिले तो आना बेकार, हिमालय की झाड़ियों में मस्त रहने वाला ‘स्केली-ब्रेस्टेड कपविंग’
हिमाचल बिजनेस। मनाली
घने देवदारों, नमी से भरी पहाड़ी हवा और बहते पहाड़ी झरनों के बीच अगर चुपचाप फुदकता हुआ कोई पक्षी दिखाई दे, तो संभव है कि वह हिमालय की जैव-विविधता का एक छोटा, लेकिन बेहद खास सितारा ‘स्केली-ब्रेस्टेड कपविंग’ हो।
9 सेंटीमीटर लंबा, लगभग बिना पूंछ वाला यह पक्षी पहली नज़र में दिखना आसान नहीं। इसका वजन मात्र 19–23 ग्राम होता है। यह पक्षी शोर नहीं करता, बल्कि झाड़ियों और निचली वनस्पति में छुपकर अपनी दुनिया बसाए रहता है।
छाती पर हल्के स्केल पैटर्न, जैतूनी रंग की पीठ
इस पक्षी की पहचान उसकी छाती पर हल्के स्केल पैटर्न और जैतूनी रंग की पीठ से होती है। पूंछ न होने के कारण यह अक्सर गोल-सा दिखाई देता है। पानी के पास वाला जंगल इसका पसंदीदा ठिकाना होता है। यह झड़ियों में मस्त रहता है।
स्केली-ब्रेस्टेड कपविंग को उपोष्णकटिबंधीय नम पर्वतीय जंगल और झरनों और नालों के आसपास की झाड़ियाँ पसंद हैं। सर्दियों में यह पक्षी ऊँचाई से नीचे की ओर आ जाता है और गर्मी का मौसम आते ही ऊंचाई की तरफ उड़ जाता है।
वजूद पर संकट के बादल
कुल्लू–मनाली में इसकी इसकी मौजूदगी गवाही देती है कि यह क्षेत्र केवल पर्यटन स्थल नहीं, दुर्लभ पक्षियों का प्राकृतिक घर भी है। यह पक्षी बताता है कि कुल्लू की घाटियाँ सिर्फ सुंदर नहीं, बल्कि जैविक रूप से जीवंत भी हैं।
यह पक्षी हिमालयी क्षेत्र में कुल्लू–मनाली, केदारनाथ सहित पूर्वी हिमालय और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पाया जाता है। आइयूसीएन की रेड लिस्ट में शामिल यह पक्षी दुर्लभ हो चुका है और उसके वजूद पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
जंगल बचेंगे तो बचेंगे परिंदे
जंगल तेज़ी से कट रहे हैं और कंक्रीट के जंगल उगने लगे हैं। पहाड़ पहले के मुक़ाबले ज्यादा गर्म होने लगे हैं। इस परिंदे के लिए यही सबसे बड़े संकट के कारण हैं। आज पक्षी संकट में हैं तो कल यह संकट इन्सानों तक आयेगा।
जब जंगल सुरक्षित होंगे, तभी ऐसे नन्हे पक्षी जीवित रहेंगे। स्केली-ब्रेस्टेड कपविंग जैसे पक्षी हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति की सबसे बड़ी खूबसूरती अक्सर सबसे छोटी होती है। अगली बार मनाली आओ तो प्रकृति के इस प्रेमी से मुलाक़ात जरूर करना।
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Jyoti maurya

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