सवा सौ साल पहले बर्फीले रेगितान की आत्मा को पढ़ गया जर्मन स्कॉलर, बर्लिन यूनिवर्सिटी में तिब्बती भाषा के पहले प्रोफेसर फ्रांके की प्रेरककथा
सवा सौ साल पहले बर्फीले रेगितान की आत्मा को पढ़ गया जर्मन स्कॉलर, बर्लिन यूनिवर्सिटी में तिब्बती भाषा के पहले प्रोफेसर फ्रांके की प्रेरककथा
विनोद भावुक। केलंग
हिमालय की ऊँची-ऊँची चोटियां, बर्फ़ से ढकी घाटियां और सदियों पुरानी कहानियां। लाहौल सिर्फ़ एक इलाका नहीं, यह इतिहास, संस्कृति और रहस्यों की जीवित किताब है। लाहौल–स्पीति अपनी दुर्गम सुंदरता और बौद्ध विरासत के लिए जाना जाता है। कम ही लोग जानते हैं कि दुनिया को लाहौल का प्राचीन इतिहास समझाने वाला एक जर्मन स्कॉलर था।
उन्नीसवीं सदी के अंत में लाहौल तक पहुँचना किसी साहसिक अभियान से कम नहीं था। उस दौर में फ्रांके पैदल, खच्चरों और पहाड़ी रास्तों के सहारे इन घाटियों में पहुँचे। सवा सौ साल पहले ऑगस्ट हरमन फ्रांके इन दुर्गम पहाड़ों में किताबों और कलम के साथ आए और वर्ष 1896 से 1908 के बीच लाहौल और लद्दाख में वह काम किया, जो हिमालयी अध्ययन की नींव माना जाता है।
लाहौल से लद्दाख तक पैदल सफर
1896 से 1908 के बीच फ्रांके ने लाहौल और लद्दाख में पैरों से पैदल रास्ते नापे, पत्थरों पर खुदे शिलालेख पढ़े और लोककथाओं को इतिहास बनाया। लाहौल की चट्टानों पर लिखे तिब्बती अभिलेख,
राजाओं की गाथाएं और बौद्ध परंपराएं, फ्रांके ने इन्हें दुनिया तक पहुँचाया।
फ्रांके के लिए लाहौल कोई शोध प्रयोगशाला नहीं था, बल्कि एक जीवित सभ्यता थी। उन्होंने स्थानीय लोगों की कथाएँ सुनीं, राजवंशों के इतिहास को जोड़ा और बौद्ध धर्म के विकास को समझा। उनके लेखन में लाहौल केवल भूगोल नहीं, बल्कि मानवीय स्मृतियों का क्षेत्र बनकर उभरा।
‘एंटीक्स ऑफ इंडियन तिब्बत’
दो वॉल्यूम में प्रकाशित उनकी किताब ‘एंटीक्स ऑफ इंडियन तिब्बत’ लाहौल, स्पीति और लद्दाख का ऐसा दस्तावेज़ बनी, जिसे आज भी शोधकर्ता बाइबल की तरह पढ़ते हैं। उनकी इस प्रसिद्ध कृति में लाहौल, स्पीति और लद्दाख की सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक विरासत का दुर्लभ विवरण बड़ी गहराई के साथ मिलता है।
जिस समय लाहौल बाहरी दुनिया से लगभग कटा हुआ था, तब फ्रांके ने यह साबित किया कि हिमालय की घाटियाँ ज्ञान से भरपूर हैं। फ्रांके लाहौल और लद्दाख को समझने वालों के लिए आज भी एक मार्गदर्शक हैं। उन्हें पढ़कर ऐसा लगता है कि ट्राइबल क्षेत्र लाहौल में पहाड़ जिनते ऊँचे हैं, इतिहास भी उतना ही गहरा है।
बर्लिन विश्वविद्यालय, तिब्बती भाषा के प्रोफेसर
भारत से लौटने के बाद फ्रांके को बर्लिन विश्वविद्यालय में तिब्बती भाषा का पहला प्रोफेसर नियुक्त किया गया। आज भी यूरोप में तिब्बती और हिमालयी अध्ययन की नींव में लाहौल में किया गया उनका शोध शामिल है। लाहौल के इतिहास को समझने वालों के लिए ऑगस्ट हरमन फ्रांके आज भी एक संदर्भ हैं, जो हिमालय को यूरोप की लाइब्रेरियों से जोड़ता है।
फ्रांके ने उस दौर में लाहौल के बारे में अध्ययन किया, जब यहाँ की आवाज़ें दुनिया तक नहीं पहुँचती थीं। उन्होंने साबित किया कि हिमालय की घाटियाँ केवल सुंदर नहीं, बौद्धिक रूप से भी समृद्ध हैं। 1907 में प्रकाशित ‘हिस्टरी ऑफ वेस्टर्न तिब्बत’ में उनके काम का पढ़ा जा सकता है। मोतीलाल बनारसीदास लिखित लद्दाख एंड तिब्बतियन स्टडीज़ में भी इनके शोध को शामिल किया गया है।
