गांधी ने जिन्हें ‘साइलेंट सरवेंट ऑफ द नेशन’ कहा, सोलन की मिट्टी में गुमनाम उनकी समाधि, सेंट स्टीफन कॉलेज दिल्ली के पहले भारतीय प्रिंसिपल को भूल गए हम

गांधी ने जिन्हें ‘साइलेंट सरवेंट ऑफ द नेशन’ कहा, सोलन की मिट्टी में गुमनाम उनकी समाधि, सेंट स्टीफन कॉलेज दिल्ली के पहले भारतीय प्रिंसिपल को भूल गए हम
गांधी ने जिन्हें ‘साइलेंट सरवेंट ऑफ द नेशन’ कहा, सोलन की मिट्टी में गुमनाम उनकी समाधि, सेंट स्टीफन कॉलेज दिल्ली के पहले भारतीय प्रिंसिपल को भूल गए हम
अजय शर्मा। सोलन
सोलन सीधे राष्ट्रीय इतिहास से जुड़ता है, जहाँ महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, सरोजिनी नायडू और सी.एफ. एंड्रयूज़ जैसी विभूतियों की वैचारिक यात्राएं एक-दूसरे से टकराती और जुड़ती रहीं। बहुत कम लोग जानते हैं कि सेंट स्टीफन कॉलेज दिल्ली के पहले भारतीय प्रिंसिपल, महात्मा गांधी के निकट सहयोगी और सी.एफ एंड्रयूज़ के आत्मीय मित्र सुशील कुमार रुद्र ने सेवानिवृत्ति के बाद सोलन में आ बसे थे।
महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में रुद्र को साइलेंट सरवेंट ऑफ द नेशन कहा कहा था। दिल्ली में गांधी के प्रवास, असहयोग आंदोलन के मसौदे और खिलाफ़त आंदोलन से जुड़ा खुला पत्र, इन सबके पीछे जिन घरों की दीवारों ने इतिहास को जन्म लेते देखा, उनमें रुद्र का नाम प्रमुख है। उसी व्यक्ति की समाधि आज सोलन की मिट्टी में लगभग गुमनाम है।
सोलन वैचारिक विरासत का संरक्षक
1923 में सेंट स्टीफन कॉलेज से सेवानिवृत्त होने के बाद रुद्र सोलन आ बसे। यह वही दौर था जब देश स्वतंत्रता संग्राम के निर्णायक चरण में प्रवेश कर रहा था। शांत पहाड़ियों में बसा सोलन वह जगह है जहाँ भारत के बौद्धिक, शैक्षिक और स्वतंत्रता आंदोलन के एक ‘मौन स्तंभ’ सुशील कुमार रुद्र ने 29 जून 1925 को अंतिम सांसे लीं। इंग्लिश चैपल, सोलन में उनका अंतिम संस्कार हुआ।
आज जब सोलन को ‘मशरूम सिटी’ या ‘एजुकेशन हब’ कहा जाता है। ऐसे में यह जानना ज़रूरी है कि आधुनिक भारतीय शिक्षा के भारतीयकरण की नींव रखने वाले व्यक्तित्व की अंतिम कर्मभूमि भी सोलन ही थी। शिक्षा जैसे पवित्र पेशे के शीर्ष व्यक्ति का इस शहर को साँझ के सफर के लिए चुनना खास था। यह शहर सिर्फ़ प्राकृतिक नहीं, बल्कि वैचारिक विरासत का भी संरक्षक है।
सोलन में समाधि, पहचान दिल्ली तक सीमित
सेंट स्टीफन कॉलेज दिल्ली के पहले भारतीय प्रिंसिपल रुद्र को सोलन से जोड़कर याद करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि वे पहले भारतीय थे, जिन्होंने किसी मिशनरी कॉलेज की कमान संभाली। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सेंट स्टीफन कॉलेज का आज भी अपना खास रुतबा है। इस कॉलेज का स्टूडेंट होना आज भी भारत में बड़े गर्व की बात है।
ब्रिटिश काल में कॉलेज प्रिंसिपल रहते उन्होंने कई क्रांतिकारी कदम उठाए। उनके क्रांतिकारी फैसलों में नस्ल के आधार पर वेतन भेद खत्म करना एक बड़ा निर्णय था। उन्होंने उच्च शिक्षा को औपनिवेशिक नियंत्रण से भारतीय चेतना की ओर मोड़ा। यह ब्लॉग इसलिए ताकि नई नस्लों को याद रहे, उनकी समाधि सोलन में है, पर पहचान दिल्ली तक सीमित रह गई।
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Jyoti maurya

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