कुल्लू–मनाली की घाटियों में जनसंघ के बीज बोने वाले नेता आयुर्वेदाचार्य यज्ञ दत्त शर्मा, पहाड़ को सियासत को हाशिये से केंद्र में लाने की पहल
कुल्लू–मनाली की घाटियों में जनसंघ के बीज बोने वाले नेता आयुर्वेदाचार्य यज्ञ दत्त शर्मा, पहाड़ को सियासत को हाशिये से केंद्र में लाने की पहल
हिमाचल बिजनेस। कुल्लू
हिमालय की शांत घाटियां कुल्लू और मनाली। आज सैलानियों, सेब और पर्यटन के लिए मशहूर ये इलाके, कभी राजनीतिक चेतना से लगभग अछूते थे। इन्हीं पहाड़ियों में एक ऐसा व्यक्ति पहुंचा, जिसने राजनीति को सत्ता नहीं, सेवा का माध्यम बनाया। पेशे से आयुर्वेदाचार्य यज्ञ दत्त शर्मा का कुल्लू–मनाली से रिश्ता केवल राजनीतिक नहीं था, मानवीय संबंध था।
1940 के दशक में, जब कांगड़ा–कुल्लू घाटी भुखमरी और बीमारी से जूझ रही थी, तब यज्ञ दत्त शर्मा पंजाब से डॉक्टरों की एक टीम लेकर पहाड़ों में पहुँचे। पुराने लोगों को अब भी याद है कि नेता नहीं, एक वैद्य आए थे, जो दवा भी देते थे और हौसला भी। इस चिकित्सक ने लोगों की सोई हुई राजनीतिक चेतना को भी जगाने का काम किया।
पहाड़ों में जनसंघ की नींव
उस दौर में कुल्लू–मनाली, कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर और शिमला राजनीतिक रूप से दूर-दराज़ और संगठनात्मक रूप से उपेक्षित क्षेत्र थे। यज्ञ दत्त शर्मा ने पैदल यात्राएं कीं, गांव-गांव प्रवास किया, स्थानीय भाषा व संस्कृति को समझा और भारतीय जनसंघ की विचारधारा को पहाड़ी समाज से जोड़ने का काम किया।
आज जिस राजनीतिक चेतना को हम हिमाचल प्रदेश में देखते हैं, उसकी जड़ें कुल्लू–मनाली की उन्हीं बैठकों और चौपालों में मिलती हैं। मनाली के आसपास की चौपालों में वे कहते थे कि पहाड़ों को भाषण नहीं, सहभागिता चाहिए। यही कारण रहा कि जनसंघ को यहां नेतृत्व थोपना नहीं पड़ा, स्थानीय कार्यकर्ता खुद लीडरशिप के लिए आगे आए।
सेवा से सत्ता तक का सफर
यज्ञ दत्त शर्मा का जीवन 1943 के बंगाल अकाल से लेकर 1947 के शरणार्थी पुनर्वास और 1990 में ओडिशा के राज्यपाल पद तक, एक ही संदेश देता है कि राजनीति, जब सेवा से जुड़ती है, तब इतिहास बनाती है।
वे पहले नेताओं में थे जिन्होंने पहाड़ को राजनीतिक हाशिये से केंद्र में लाने का प्रयास किया। जिन्होंने आयुर्वेद, सेवा और संगठन को एक सूत्र में पिरोया और जिनकी नींव पर आगे चलकर हिमाचल प्रदेश की राजनीतिक संरचना खड़ी हुई।
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