पालमपुर की पढ़ाई, नेपाल के काम आई, कृषि पर ऐतिहासिक किताब लिखने के लिए नर बहादुर साउद को मिला नेपाल का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ‘मदन पुरस्कार’
पालमपुर की पढ़ाई, नेपाल के काम आई, कृषि पर ऐतिहासिक किताब लिखने के लिए नर बहादुर साउद को मिला नेपाल का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ‘मदन पुरस्कार’
हिमाचल बिजनेस
दस साल के शोध के बाद 2009 में प्रकाशित हुई पुस्तक ‘Nepalko Balinali ra Tinko Digo Kheti’ (नेपाल की फसलें और उनकी टिकाऊ खेती) नेपाल में आधुनिक कृषि, फसल विविधता और टिकाऊ खेती के लिए वरदान बन गई। इस ऐतिहासिक किताब के लिए नेपाल के बैतड़ी ज़िले नर बहादुर साउद नेपाल का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ‘मदन पुरस्कार’ मिला।
कम लोग जानते हैं कि इस ऐतिहासिक पुस्तक की वैचारिक नींव पालमपुर की कृषि शिक्षा से जुड़ी है।
चौधरी सरवण कुमार कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर ने नेपाल जैसे पड़ोसी देश को एक ऐसा विचारक दिया, जिसने खेती को जीवन, पर्यावरण और आत्मनिर्भरता से जोड़ा। पालमपुर की कक्षाओं में सीखी गई खेती से नर बहादुर साउद ने सीमाओं से परे समाज को बादल दिया।
पढ़ने के लिए मिली सरकारी स्कॉलरशिप
पालमपुर केवल कृषि शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों की कर्मभूमि भी रहा है, जिन्होंने अपने जीवन संघर्ष से पूरे समाज को दिशा दी। नेपाल के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और लेखक नर बहादुर साउद की कहानी इसका जीवंत उदाहरण है। वे सरकारी छात्रवृत्ति पर पालमपुर में कृषि विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। यहीं उन्हें आधुनिक कृषि, फसल विविधता और टिकाऊ खेती की समझ मिली, जिसने आगे चलकर उनके लेखन को दिशा दी।
हादसे के बाद लेखन की शुरुआत
नेपाल लौटकर साउद ने नेपाल कृषि अनुसंधान परिषद और बाद में डेयरी डेवलपमेंट कॉरपोरेशन
में तकनीकी अधिकारी के रूप में काम किया। ड्यूटी के दौरान एक सड़क दुर्घटना ने उन्हें कमर से नीचे लकवाग्रस्त कर दिया। व्हीलचेयर तक सीमित हो जाने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। अपने अनुभव, अध्ययन से भारत–नेपाल की कृषि समझ को आधार बनाकर एक किताब लेखन किया।
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