कुल्लू- मनाली की बर्फ़ में सोया ऑस्ट्रेलियाई पर्वतारोही, पापसुरा फतह करने वाले जियोफ्री लियोनार्ड हिल की अधूरी यात्रा की कहानी

कुल्लू- मनाली की बर्फ़ में सोया ऑस्ट्रेलियाई पर्वतारोही, पापसुरा फतह करने वाले जियोफ्री लियोनार्ड हिल की अधूरी यात्रा की कहानी
कुल्लू- मनाली की बर्फ़ में सोया ऑस्ट्रेलियाई पर्वतारोही, पापसुरा फतह करने वाले जियोफ्री लियोनार्ड हिल की अधूरी यात्रा की कहानी
विनोद भावुक। मनाली
हिमाचल प्रदेश की ऊँची-ऊँची चोटियाँ केवल पहाड़ नहीं हैं, वे साहस, संघर्ष और बलिदान की मूक गवाह भी हैं। ऐसी ही एक कहानी जुड़ी है ऑस्ट्रेलिया के पर्वतारोही जियोफ्री लियोनार्ड हिल से, जिन्होंने हिमाचलप्रदेश की एक दुर्गम चोटी को तो फतह कर लिया, लेकिन पहाड़ों ने उन्हें हमेशा के लिए अपने पास रोक लिया।
कुल्लू–लाहौल क्षेत्र की 6451 मीटर ऊँची चोटी पापसुरा, जिसे स्थानीय लोग ‘पीक ऑफ़ ईविल’ भी कहते हैं। 3 जून 1967 के दिन जियोफ्री लियोनार्ड हिल और उनके साथी कॉलिन प्रिचार्ड इस चोटी पर पहली बार सफलतापूर्वक पहुँचे। यह हिमालय के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि पापसुरा तकनीकी रूप से बेहद कठिन और ख़तरनाक मानी जाती है।
न्यूज़ीलैंड में सीखीं पर्वतारोहण की बारीकियाँ
1941 में जन्मे जियोफ्री हिल पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने न्यूज़ीलैंड में पर्वतारोहण की बारीकियाँ सीखीं, और बाद में भारत आए। यहाँ वे केवल पर्वतारोही नहीं थे, बल्कि पेशे से आर्किटेक्ट के रूप में भी काम कर रहे थे। भारत और खासकर हिमालय उनके लिए केवल कार्यस्थल नहीं, एक बुलावा था ऊँचाइयों का।
पापसुरा की ऐतिहासिक चढ़ाई के कुछ ही महीनों बाद अक्टूबर 1967 में जियोफ्री हिल एक और अभियान पर निकले। लक्ष्य था 6069 मीटर ऊँची चोटी मुकर्बेह, जो कुल्लू ज़िले में ही स्थित है। अभियान का 13वाँ दिन और तभी मौसम ने करवट ली। तेज़ बर्फ़बारी, भयंकर तूफ़ान और हिम-आंधी ने पूरी टीम को अपनी चपेट में ले लिया।
रात में भारी बर्फ़ के नीचे दब गया टेंट
रात के समय एक टेंट भारी बर्फ़ के नीचे दब गया। इस हादसे में जियोफ्री लियोनार्ड हिल, भारतीय पर्वतारोही सुरेश कुमार और शेरपा पेम्बार तीनों की मृत्यु हो गई। जियोफ्री हिल को मनाली के लेडी विलिंगडन मेमोरियल हॉस्पिटल के परिसर में दफनाया गया। आज भी, हिमालय की वादियों में
उनका नाम श्रद्धा से लिया जाता है।
जियोफ्री लियोनार्ड हिल उन विदेशी पर्वतारोहियों में से थे, जिन्होंने हिमाचल को केवल चुनौती नहीं,
घर की तरह अपनाया। हिल का नाम द हिमालयन जर्नल और हिमालयन क्लब के ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में दर्ज है। उनकी कहानी याद दिलाती है कि हिमालय सुंदर है, लेकिन उतना ही निर्दयी भी है। जो यहाँ आते हैं, वे सिर्फ़ चोटियाँ नहीं चढ़ते, वे अपना सब कुछ दाँव पर लगाते हैं।
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Jyoti maurya

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