कांगड़ा से रहा महाराजा शेर सिंह का खास जुड़ाव, लाहौर की महारानियां बनीं कांगड़ा की कुंदो और दुखनो

कांगड़ा से रहा महाराजा शेर सिंह का खास जुड़ाव, लाहौर की महारानियां बनीं कांगड़ा की कुंदो और दुखनो
कांगड़ा से रहा महाराजा शेर सिंह का खास जुड़ाव, लाहौर की महारानियां बनीं कांगड़ा की कुंदो और दुखनो
विनोद भावुक। कांगड़ा
जब भी सिख साम्राज्य के उतार–चढ़ाव की चर्चा होती है, महाराजा रणजीत सिंह का नाम सबसे पहले आता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा योद्धा भी दर्ज है जिसकी जीवन-यात्रा कांगड़ा की पहाड़ियों से शुरू होकर लाहौर के तख़्त तक पहुंची थी। यह सिख योद्धा थे महाराजा शेर सिंह। 19वीं सदी के शुरुआती वर्षों में कांगड़ा पहाड़ी इलाका होने के बावजूद उत्तर भारत की राजनीति और सैन्य रणनीति का अहम केंद्र था।
महाराजा शेर सिंह का कांगड़ा से संबंध सैन्य अभियानों, राजनीतिक गठबंधनों और व्यक्तिगत जीवन, तीनों स्तरों पर जुड़ा रहा। साल 1831 में जब सैयद अहमद बरेलवी ने सिखों के विरुद्ध जिहाद का ऐलान कर बालाकोट में डेरा डाला, तो महाराजा रणजीत सिंह ने जिस योद्धा पर भरोसा किया, वह थे शेर सिंह। बालाकोट अभियान के बाद सिख सत्ता की पकड़ कांगड़ा–कुल्लू क्षेत्र में और मजबूत हुई। पहाड़ी क्षेत्रों में विद्रोह की संभावनाएँ खत्म हुईं।
कांगड़ा की बेटियां लाहौर की महारानियां
इतिहास का एक कम जाना गया पहलू यह भी है कि महाराजा शेर सिंह के ज़नाने में कांगड़ा की महिलाएं भी शामिल थीं। कुंदो कांगड़ा के पास के एक गांव से लाई गई थी जिससे बाद में उन्होंने विवाह किया। दुखनो कांगड़ा में तैनात कारदार द्वारा महाराजा को भेंट स्वरूप दी गई गई थी।
तथ्य बताते हैं कि सिख साम्राज्य के दौरान कांगड़ा केवल सैनिक चौकी नहीं, बल्कि सिख दरबार की सांस्कृतिक और सामाजिक परिधि का हिस्सा था। कांगड़ा जैसे इलाकों में स्थानीय जातियों में विश्वास, पहाड़ी प्रशासन पर पकड़ और सीमावर्ती सुरक्षा का प्रबंधन शेर सिंह की राजनीतिक समझ को दर्शाता है।
कांगड़ा का अनुभव, लाहौर का तख्त
कांगड़ा का अनुभव महाराजा शेर सिंह को आगे चलकर उन्हें लाहौर के तख़्त तक ले गया। 1841 में जब वे महाराजा बने, तब साम्राज्य भीतर से कमजोर था, दरबार साज़िशों से भरा था और 1843 में वही हुआ, जो सिख साम्राज्य के पतन का संकेत बन गया। महाराजा शेर सिंह की लाहौर में निर्मम हत्या हो गई।
महाराजा शेर सिंह का जब भी जिक्र होता है, तो कांगड़ा को सिख साम्राज्य की रणनीतिक रीढ़ बनाने और पहाड़ी समाज को साम्राज्य की मुख्यधारा से जोड़ने का क्रेडिट उनको जाता है। उन्होंने यह साबित किया कि पहाड़ केवल सीमाएं ही नहीं, सत्ता की दिशा भी तय करते है।
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Jyoti maurya

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