धर्मशाला से तिब्बती चिकित्सा को अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचाने वाली डॉक्टर डोल्मा, दलाई लामा की डॉक्टर के तौर पर रहीं मशहूर

धर्मशाला से तिब्बती चिकित्सा को अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचाने वाली डॉक्टर डोल्मा, दलाई लामा की डॉक्टर के तौर पर रहीं मशहूर
धर्मशाला से तिब्बती चिकित्सा को अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचाने वाली डॉक्टर डोल्मा, दलाई लामा की डॉक्टर के तौर पर रहीं मशहूर
विनोद भावुक। धर्मशाला
साल 1959 में जब 14वें दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत आए, तब लोबसंग डोल्मा भी अपनी दो छोटी बेटियों को पीठ पर बांधकर इस कठिन यात्रा में शामिल हुईं। निर्वासन के शुरुआती वर्षों में उन्होंने पालमपुर, मनाली, लाहौल और आसपास के इलाकों में सड़क निर्माण कार्य तक किया, ताकि परिवार का पालन-पोषण हो सके।
धर्मशाला पहुंचने पर उन्हें तिब्बती चिकित्सा संस्थान मेन टसी खाँग में इसलिए शामिल होने से पहले मना कर दिया गया क्योंकि वे महिला थीं, लेकिन समय बदला। 1972 में वे न केवल इस संस्थान से जुड़ीं, बल्कि इस चिकित्सा संस्थान की पहली महिला मुख्य चिकित्सक बनीं और सारी दुनिया में दलाई लामा की डॉक्टर के रूप में जानी गईं।
तिब्बत की धरती पर जन्म, चिकित्सा की विरासत
6 जुलाई 1934 को तिब्बत के क्यिरोंग क्षेत्र में जन्मी लोबसंग डोल्मा 13वीं पीढ़ी की पारंपरिक तिब्बती चिकित्सक थीं। चिकित्सा उनके लिए पेशा नहीं, बल्कि विरासत थी। अपने पिता से उन्होंने बचपन में ही तिब्बती चिकित्सा, प्रशासन और सेवा का गहन प्रशिक्षण लिया। उन्होंने तिब्बती चिकित्सा, ज्योतिष और बौद्ध दर्शन में उच्च शिक्षा प्राप्त की। कठिन साधना, कठोर अध्ययन और सेवा संतुलन उनकी पहचान बना।
धर्मशाला से उन्होंने तिब्बती चिकित्सा को अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचाया। विश्व स्वास्थ्य संस्थान, विश्वविद्यालयों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में उनके व्याख्यानों ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई। बाद में उन्होंने निजी क्लिनिक खोला और महिलाओं व बच्चों के इलाज में खुद को समर्पित किया। कई जगहों पर उन्होंने निःशुल्क चिकित्सा सेवा भी दी।
मां की विरासत को संरक्षित कर रही बेटी
15 दिसंबर 1989 को धर्मशाला में उनका निधन हुआ। आज भी धर्मशाला में उनका क्लिनिक मशहूर है, जिसे उनकी बेटी आगे बढ़ा रही हैं। इस क्लीनिक में तिब्बती चिकित्सा पद्दति से उपचार किया जाता है। आज भी यह क्लीनिक कैंसर जैसी असाध्य रोग के उपचार के देश भर में मशहूर है और देश के कई हिस्सों से लोग उपचार के लिए यहाँ आते हैं।
डॉ. लोबसंग डोल्मा खंगकर की कहानी सिर्फ एक डॉक्टर की नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस, महिला सशक्तिकरण की कहानी है। यह प्रेरककथा तिब्बती निर्वासन इतिहास की भी जीवंत मिसाल है। मनाली और धर्मशाला उनकी यात्रा के ऐसे पड़ाव हैं, जहां दर्द भी था और उम्मीद भी। यह इस बात की भी गवाही है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है।
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Jyoti maurya

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