डगशाई ने पहली बार भारतीय महिलाओं ने पहनी थी सैनिक की वर्दी, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई थी वूमेन एग्जेलरी कॉर्पस इंडिया की स्थापना
डगशाई ने पहली बार भारतीय महिलाओं ने पहनी थी सैनिक की वर्दी, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई थी वूमेन एग्जेलरी कॉर्पस इंडिया की स्थापना
अजय शर्मा। सोलन
2005 में प्रकाशित एलन हार्ड फील्ड की पुस्तक ‘वूमेन एग्जेलरी कॉर्पस ( इंडिया)’ के मुताबिक मार्च 1942 में, बर्मा फ्रंट पर युद्ध की स्थिति बिगड़ने के बाद वूमेन एग्जेलरी सर्विस (बर्मा) से विकसित होकर वूमेन एग्जेलरी कॉर्पस (इंडिया) का गठन किया गया।

ट्रेनिंग, परेड और निरीक्षण केंद्र
दूसरे विषय युद्ध के समाप्त होते-होते वूमेन एग्जेलरी कॉर्पस में 11,500 महिलाएँ भर्ती हो चुकी थीं। भर्ती की न्यूनतम आयु पहले 18 वर्ष थी, जिसे दिसंबर 1942 से 17 वर्ष कर दिया गया। इनके जिम्मे क्लेरिकल काम, संचार, रिकॉर्ड, घरेलू और तकनीकी सहायता जैसे काम थे।
लोकल सेवा के तहत सीमित क्षेत्र में तैनाती होती थी जबकि जनरल सर्विस के चलते पूरे भारत में कहीं भी तैनाती होती थी। हिमाचल की ठंडी पहाड़ियों में स्थित डगशाई कैंटोनमेंट उस समय वूमेन एग्जेलरी कॉर्पस (इंडिया) की ट्रेनिंग, परेड और निरीक्षणों का प्रमुख केंद्र रहा।
महिलाओं से सीखी सैनिक की भाषा
2017 में प्रकाशित सुदर्शना सेन की पुस्तक ‘एंग्लो इंडियन वुमेन इन ट्रांजीसन, स्प्रिंगर’ के अनुसार डगशाई में महिलाओं ने सैन्य अनुशासन, यूनिफॉर्म में परेड, आदेश और जिम्मेदारी की भाषा सीखी। डगशाई में ली गई तस्वीरें आज भी गवाही देती हैं, जब भारतीय महिलाएँ पहली बार सैन्य संरचना का हिस्सा बनीं।
दो मिलियन से अधिक पुरुष सैनिकों के मुकाबले 11,500 महिलाओं की संख्या कम थी। जाति और सामुदायिक झिझक, पुरुषों के साथ काम करने पर सामाजिक रोक और पारंपरिक पारिवारिक सोच इसके मुख्य कारण थे। इसी वजह से वूमेन एग्जेलरी कॉर्पस में बड़ी संख्या एंग्लो–इंडियन समुदाय की महिलाओं की रही।

वायुसेना और नौसेना की राह
वूमेन एग्जेलरी कॉर्पस के भीतर एक स्वतंत्र एयर विंग भी था, जो भारतीय महिलाओं का वायुसेना सहयोग में पहला संगठित प्रवेश बना। शुरुआत में मौजूद नेवल विंग को 1944 में अलग कर दिया गया और वुमेन रॉयल इंडियन नेवल सर्विस की स्थापना हुई।
भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं की भागीदारी की नींव, डगशाई में ही रखी गई। बिहार की मोइना इमाम वूमेन एग्जेलरी कॉर्पस में शामिल होने वाली शुरुआती भारतीय महिलाओं में थीं। वे इतनी चर्चित हुईं कि कॉर्पस की पोस्टर गर्ल बन गईं। उनकी तस्वीरें उस दौर की भारतीय महिला की नई पहचान बनीं।
डगशाई की खामोश विरासत
सुदर्शना सेन की पुस्तक ‘एंग्लो इंडियन वुमेन इन ट्रांजीसन, स्प्रिंगर’ डगशाई से महिलाओं के लिए सेना में जाने की एक क्रांतिकारी शुरुआत थी। यहाँ की मिट्टी ने महिलाओं को राष्ट्र सेवा और देश सेवा के लिए सर्वस्व होम करने की हिम्मत दी गई। यह डगशाई की खामोश विरासत है।
डगशाई की पहाड़ियाँ उस दौर की गवाह हैं जब भारतीय महिलाओं ने पहली बार कहाकि हम युद्ध के मैदान में नहीं, लेकिन युद्ध की रीढ़ बनकर खड़ी होंगी। वूमेन एग्जेलरी कॉर्पस भले ही इतिहास की कम जानी-पहचानी कहानी हो, लेकिन आज भारतीय सेना में महिलाओं की मज़बूत मौजूदगी की जड़ें डगशाई से यहीं से फूटी थीं।

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