तलवार और तूलिका से इतिहास रचने वाले कांगड़ा के गवर्नर देसा सिंह मजीठिया, पहाड़ों में सिख सत्ता स्थापित करने वाले सरदार
तलवार और तूलिका से इतिहास रचने वाले कांगड़ा के गवर्नर देसा सिंह मजीठिया, पहाड़ों में सिख सत्ता स्थापित करने वाले सरदार
विनोद भावुक। कांगड़ा
धौलाधार की गोद में बसे कांगड़ा के पहाड़ केवल किलों और देवस्थानों के लिए ही नहीं, बल्कि सिख साम्राज्य के निर्णायक विस्तार के साक्षी भी रहे हैं। इसी इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय का नाम है सरदार देसा सिंह मजीठिया, जिनकी भूमिका ने कांगड़ा को सैन्य, प्रशासनिक और सांस्कृतिक तीनों स्तरों पर नई पहचान दी।
साल 1809 में कांगड़ा और पड़ोसी पहाड़ी रियासतें गोरखा सेनाओं के दबाव में थीं।
महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में चले अभियान में देसा सिंह मजीठिया ने महत्वपूर्ण सैन्य भूमिका निभाई। गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा को पीछे हटना पड़ा और कांगड़ा की पहाड़ियां सिखों के नियंत्रण में आ गईं। इस विजय के बाद देसा सिंह को कांगड़ा का गवर्नर नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति सिर्फ़ प्रशासनिक नहीं, बल्कि साम्राज्य के भरोसे का प्रतीक थी।
किले से कला तक: कांगड़ा का नया अध्याय
कांगड़ा का इतिहास कांगड़ा किले के इर्द-गिर्द घूमता है, पर देसा सिंह के दौर में यहाँ सत्ता का चेहरा केवल सैन्य नहीं रहा। वे उन शुरुआती सिख शासकों में थे जिन्होंने पहाड़ी कला को संरक्षण दिया। 1810–1830 के बीच कांगड़ा और आसपास के क्षेत्रों में पहाड़ी कलाकारों को संरक्षण मिला दरबार, शासन और जनजीवन को चित्रों में उतारने की परंपरा फली-फूली। इस तरह कांगड़ा केवल युद्धभूमि नहीं, सांस्कृतिक सेतु भी बना।
अमृतसर से कांगड़ा तक प्रशासन
देसा सिंह मजीठिया को कांगड़ा के साथ-साथ अमृतसर का दायित्व भी सौंपा गया। यह दोहरी ज़िम्मेदारी बताती है कि सीमांत पहाड़ों से लेकर धार्मिक-व्यापारिक केंद्रों तक, सिख साम्राज्य के लिए कांगड़ा कितना रणनीतिक था।
हरिपुर जैसे क्षेत्रों का प्रशासनिक अधिग्रहण और मुल्तान अभियान में भागीदारी, इन सबने देसा सिंह को एक कुशल सेनापति और प्रशासक के रूप में स्थापित किया।
विरासत जो पहाड़ों में बस गई
1832 में देसा सिंह मजीठिया के निधन के बाद उनके पुत्र लेहना सिंह मजीठिया ने प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालीं। पर गोरखाओं से मुक्ति का स्मरण, सिख प्रशासन की स्थिरता और पहाड़ी कला को संरक्षण को लेकर कांगड़ा में देसा सिंह मजीठिया की सबसे स्थायी छाप रही। कांगड़ा के अतीत में देसा सिंह मजीठिया का नाम सत्ता और संस्कृति के संगम के रूप में उभरता है। एक ऐसा अध्याय जहां तलवार और तूलिका, दोनों ने इतिहास रचा।
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