मनाली में हुआ भारतीय सिनेमा की ‘फ़र्स्ट लेडी’ के जीवन का वह इंटरवल, नग्गर गांव में देविका रानी की आत्मा ने ली सांस
मनाली में हुआ भारतीय सिनेमा की ‘फ़र्स्ट लेडी’ के जीवन का वह इंटरवल, नग्गर गांव में देविका रानी की आत्मा ने ली सांस
विनोद भावुक! मनाली
हिंदी सिनेमा की पहली सुपरस्टार, बॉम्बे टॉकीज़ की धड़कन और कैमरे की सबसे बेबाक नायिका देविका रानी जब ग्लैमर की चकाचौंध से दूर हुईं, तो उन्होंने हिमाचल प्रदेश की वादियों में बसे मनाली के नग्गर गांव को अपना ठिकाना बनाया। यह फ़ैसला किसी फ़िल्मी क्लाइमैक्स से कम नहीं था, जहां पर्दा गिरता है और ज़िंदगी की नई पटकथा लिखी जाती है।
1945 में रूसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रोरिख से विवाह के बाद देविका रानी ने अभिनय को कट कहा। फेड आउट बॉम्बे का हुआ और फेड इन मनाली के न नग्गर का। बर्फ़ीली चोटियां, देवदारों की खुशबू और ब्यास की सरगोशियां, उनकी पोस्ट क्रेडिट लाइफ़ यहीं से शुरू हुई।
जहां कैमरा रुका, नज़रें ठहर गईं
नग्गर में धीमा, सधा हुआ और अर्थपूर्ण उनका जीवन किसी आर्ट फ़िल्म की तरह था। यहां उन्होंने वन्यजीवन पर डॉक्यूमेंट्रीज़ बनाईं, प्रकृति को समझा और नेहरू परिवार से निकटता बनी। शोर-शराबे से दूर यह ठहराव, उनके व्यक्तित्व का वह पहलू सामने लाता है जो फिल्मी पर्दे पर कभी नहीं दिखा।
देविका रानी सिर्फ़ अभिनेत्री नहीं थीं। वे डिज़ाइनर, आर्ट डायरेक्टर और ग्लोबल सिनेमा की ट्रेनिंग पाई हुई कलाकार थीं। ‘कर्मा’ की ऐतिहासिक किस से लेकर ‘अछूत कन्या’ की सामाजिक चुनौती तक, उन्होंने हर फ्रेम में जोखिम लिया। नग्गर में आकर यही साहस सादगी में बदल गया, जैसे किसी फ़िल्म का सबसे शांत, सबसे गहरा सीन।
सम्मान, विरासत और पहाड़ों की छाया
पद्म श्री और दादा साहेब फाल्के पुरस्कारों सहित देविका रानी की शेल्फ़ भले ही कई ट्राफियों से भरी रही, पर मनाली में उन्होंने एकांत को चुना। बाद के वर्षों में वे बेंगलुरु में जा बसीं, लेकिन नग्गर उनके जीवन का वह इंटरवल था जहां उनकी आत्मा ने सांस ली।
2020 में प्रकाशित किश्वर देसाई की पुस्तक ‘ द लोंगेस्ट किस : द लाईफ एंड टाइम्स ऑफ देविका रानी’ के मुताबिक आज भी मनाली की हवाओं में देविका रानी की कहानी तैरती है कि कैसे भारतीय सिनेमा की ‘फ़र्स्ट लेडी’ ने पहाड़ों में ख़ामोशी का अभिनय चुना और उसे भी यादगार बना दिया।
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