दुनिया को कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग्स से परिचित करवाने वाले डॉ. एम. एस. रंधावा, कांगड़ा घाटी से ही जन्मी उनकी कालजयी कृतियां
दुनिया को कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग्स से परिचित करवाने वाले डॉ. एम. एस. रंधावा, कांगड़ा घाटी से ही जन्मी उनकी कालजयी कृतियां
विनोद भावुक। कांगड़ा
धौलाधार की गोद में बसी कांगड़ा घाटी सिर्फ़ पहाड़ों, नदियों और पहाड़ी चित्रकला के लिए नहीं जानी जाती, उन दूरदर्शी व्यक्तित्वों के लिए भी पहचानी जाती है, जिन्होंने प्रकृति, कला और समाज तीनों को एक सूत्र में पिरो दिया। पंजाब का ‘छठा दरिया’ के नाम से पुकारे जाने वाले डॉ. मोहिन्द्र सिंह रंधावा जब कांगड़ा आए, तो उन्होंने कांगड़ा को केवल एक सुंदर घाटी के तौर पर ही नहीं, एक जीवित प्रयोगशाला की तरह देखा।
‘ट्रेवल्स इन वेस्ट्रन हिमालय’, ‘कांगड़ा वैली पेंटिंग्स’ ‘कांगड़ा पेंटिंग्स ऑन लव’ और ‘कांगड़ा रागमाला पेंटिंग्स’, जैसी पुस्तकों ने कांगड़ा पेंटिंग को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई और यह साबित किया कि हिमालय सिर्फ़ भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मा है। डॉ. रंधावा की यह कालजयी कृतियां कांगड़ा घाटी से ही जन्मी और कांगड़ा की लोक संस्कृति ने वैश्विक स्तर पर अपनी चमक बिखेरी।
कला, कृषि और कांगड़ा का संगम
डॉ. रंधावा का जीवन अनोखा था। वे ग्रीन रिवॉल्यूशन के सूत्रधारों में थे। उन्होंने कांगड़ा, बसोहली और गुलेर चित्रकला को दस्तावेज़ी रूप दिया और चंडीगढ़ रोज़ गार्डन जैसे सौंदर्य प्रतीकों के शिल्पकार बने। कांगड़ा घाटी में घूमते हुए उन्होंने यह समझा कि यहां की कला और कृषि एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक शक्तियां हैं। खेतों की हरियाली और चित्रों की कोमल रेखाएं, दोनों में ही जीवन का उत्सव है।
डॉ. रंधावा ने कांगड़ा चित्रकला को केवल ‘राजा-रानी’ या ‘राधा-कृष्ण’ तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे मानव संवेदना, ऋतुचक्र और प्रकृति-प्रेम की अभिव्यक्ति बताया। उनकी दृष्टि में कांगड़ा पेंटिंग प्रेम, संगीत और मौसम तीनों का संगम हैं। पहाड़ी चित्रकला महज कला नहीं, जीवन दर्शन है। कांगड़ा पेंटिंग पर शोध करने वाला हर स्टूडेंट सबसे पहले डॉ. रंधावा की पुस्तकों की ओर लौटता है।
पीढ़ियों के लिए प्रेरक
डॉ. रंधावा ने सिखाया कि एक प्रशासक भी कवि हो सकता है, एक वैज्ञानिक भी कलाकार बन सकता है और एक इतिहासकार भी माली की तरह भविष्य बो सकता है।कांगड़ा घाटी उनके लिए सिर्फ़ अध्ययन का विषय नहीं थी। यह संवाद की जगह थी। डॉ. रंधावा की सोच में कांगड़ा दुनिया की ऐसी बिरली जगह थी, जहां पहाड़, चित्र और मनुष्य आपस में बात करते हैं।
जब भी कांगड़ा की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने की बात होती है, तो डॉ. रंधावा का जीवन संदेश देता है कि विकास और विरासत साथ चल सकते हैं। उनकी सबसे बड़ी सीख यह है कि प्रकृति को समझना ही सच्ची प्रगति है और धौलाधार अगर सुना जाए तो बहुत कुछ सिखाता है।
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