शिमला ने दी विश्व साहित्य को नई दिशा, रुडयार्ड किपलिंग की कल्पनाओं को लगे पंख
शिमला ने दी विश्व साहित्य को नई दिशा, रुडयार्ड किपलिंग की कल्पनाओं को लगे पंख
विनोद भावुक। शिमला
शिमला सिर्फ़ ठंडी हवा, मॉल रोड और औपनिवेशिक इमारतों का शहर नहीं है। यह वह जगह भी है जहाँ दुनिया के महान लेखकों में शुमार रुडयार्ड किपलिंग की लेखनी ने आकार लिया, जहां कहानियां केवल लिखी नहीं गईं, बल्कि जी गईं।
1880 के दशक में, जब शिमला ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी था, तब हर साल यहां सत्ता, समाज और संस्कृति का संगम होता था। लाहौर और इलाहाबाद के तपते अख़बारी दफ़्तरों से निकलकर किपलिंग जब शिमला पहुंचते, तो उनके शब्दों में जैसे जान आ जाती थी। वे खुद लिखते हैं, ‘शिमला में बिताया हर महीना शुद्ध आनंद था। हर सुनहरा घंटा क़ीमती लगता था।‘
‘प्लेन टेल्स फ़्रोम हिल्स’ और शिमला
किपलिंग की शुरुआती प्रसिद्धि का बड़ा आधार बनी उनकी पुस्तक ‘प्लेन टेल्स फ़्रोम हिल्स’ और जैसा नाम से ही ज़ाहिर है, इसकी आत्मा पहाड़ों में बसती थी। इन कहानियों में शिमला सिर्फ़ पृष्ठभूमि नहीं था। शिमला में क्लबों की गपशप, अफ़सरों की महत्वाकांक्षाएं, सामाजिक दिखावे और मानवीय कमजोरियां उनकी कहानियों में शामिल थीं।
देवदारों के बीच बसता शिमला शहर, किपलिंग की कहानियों में साम्राज्य की चमक और उसके भीतर की दरार, दोनों को उजागर करता है।
शिमला से होकर गुज़रीं ‘किम’ की राहें
हालांकि उपन्यास ‘किम’ का कथानक पूरे उत्तर भारत में फैला है, लेकिन इसकी कल्पनात्मक दुनिया को गढ़ने में शिमला की भूमिका अनदेखी नहीं की जा सकती। यह वही शहर था जहां सत्ता के गलियारों की नब्ज़ समझ में आती थी। शिमला की पहाड़ियों में जासूसी, राजनीति और संस्कृति आपस में घुलती दिखती थीं।
शिमला में बिताए शांत दिनों ने किपलिंग को वह दृष्टि दी, जिससे वे भारत को उपनिवेश के रूप में नहीं, एक कथाकार की तरह देख पाए।
सत्ता और सृजन का संगम शिमला
दिन में जहां वायसराय और अफ़सर फ़ाइलें निपटाते थे, वहीं शाम को लकड़ी की आग जलती, चाय की प्यालियां खनकतीं और किपलिंग जैसे लेखक शब्दों से इतिहास रचते। यही शिमला की खासियत थी। शिमला में प्रशासन और कल्पना, दोनों साथ-साथ चलते थे।
शिमला में किपलिंग की मौजूदगी हमें याद दिलाती है कि यह शहर केवल देखने की जगह नहीं, लिखने और सोचने की जगह रहा है और यहां की हवा ने विश्व साहित्य को दिशा दी। शिमला की पगडंडियों पर चलते हुए अगर आज भी कोई कहानी जन्म लेती है, तो उसमें कहीं न कहीं किपलिंग की छाया ज़रूर होगी।
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