शिमला ने देखा अंबिका धुरंधर का गोल्डन कैनवास, ‘शिवराज्याभिषेक’ और ‘देवी अंबिका योगिनियों के साथ’ पेंटिंग्स ने रचा इतिहास
शिमला ने देखा अंबिका धुरंधर का गोल्डन कैनवास, ‘शिवराज्याभिषेक’ और ‘देवी अंबिका योगिनियों के साथ’ पेंटिंग्स ने रचा इतिहास
विनोद भावुक। शिमला
जब देश में महिला कलाकारों के लिए मंच सीमित थे, तब सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट मुंबई से पढ़कर निकली अंबिका धुरंधर ने इतिहास रचा था । वे उन शुरुआती महिलाओं में थीं जिन्होंने पेंटिंग में औपचारिक डिग्री हासिल की। उनकी कला की यात्रा सिर्फ़ कक्षाओं तक सीमित नहीं रही, उनके रंग देशभर में घूमे और शिमला उनमें एक अहम पड़ाव बना।
शिमला में कला और इतिहास का संगम
1930–40 के दशक में शिमला सांस्कृतिक प्रदर्शनियों का प्रमुख केंद्र था। अंबिका धुरंधर की पेंटिंग्स ‘शिवराज्याभिषेक’ और ‘देवी अंबिका योगिनियों के साथ’ जब शिमला में प्रदर्शित हुईं, तो दर्शकों ने पहली बार पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं को इतनी जीवंतता से कैनवास पर उतरते देखा। देवदारों के शहर में उनके चित्रों ने मानो इतिहास को रंगों में फिर से जगा दिया।
प्रसिद्ध कलाकार एम.वी. धुरंधर की बेटी होने के बावजूद अंबिका ने अपनी अलग पहचान बनाई। शिमला की प्रदर्शनी में आलोचकों ने साफ़ कहा था, ‘यह सिर्फ़ परंपरा का अनुसरण नहीं, बल्कि उसका सशक्त विस्तार है।‘ शिमला के बाद दिल्ली, मैसूर, बेंगलुरु जैसे कई शहरों में उनकी कला को सम्मान मिला।
रंग बने आज़ादी की आवाज़
अंबिका धुरंधर सिर्फ़ चित्रकार नहीं थीं, वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और बाद में संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन से भी जुड़ी रहीं। उनकी कला में राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और नारी शक्ति की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्होंने रंगों के जरिये आजादी की आवाज की। शिमला में प्रदर्शित उनके कैनवास उस दौर के भारत की आत्मा को बयान करते थे।
आज जब शिमला कला उत्सवों, विरासत संरक्षण और रचनात्मक पर्यटन की बात करता है, तब अंबिका धुरंधर की विरासत और भी प्रासंगिक लगती है। अंबिका धुरंधर याद दिलाती हैं कि कला सिर्फ़ सजावट नहीं, इतिहास और विचारों का दस्तावेज़ होती है। देवदारों के बीच कभी जिन कैनवासों ने दर्शकों को चुप करा दिया था, वे आज भी शिमला की सांस्कृतिक स्मृति में जीवित हैं।
