जब शिमला ने गुनगुनाया ‘सारे जहां से अच्छा’, देवदारों के शहर में गंभीर बहसों का हिस्सा बनीं इक़बाल की कविताएं

जब शिमला ने गुनगुनाया ‘सारे जहां से अच्छा’, देवदारों के शहर में गंभीर बहसों का हिस्सा बनीं इक़बाल की कविताएं
जब शिमला ने गुनगुनाया ‘सारे जहां से अच्छा’, देवदारों के शहर में गंभीर बहसों का हिस्सा बनीं इक़बाल की कविताएं
विनोद भावुक। शिमला
शिमला की वादियों में अगर आज भी कोई पंक्ति हवा के साथ तैरती महसूस होती है, तो वह है ‘सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा’। यह सिर्फ़ एक गीत नहीं, बल्कि उस दौर की आवाज़ थी, जब भारत अपनी आत्मा खोज रहा था। इस आवाज़ के रचनाकार थे दार्शनिक, कवि और विचारक अल्लामा सर मुहम्मद इक़बाल।
कम लोग जानते हैं कि इक़बाल का रिश्ता शिमला से केवल पहाड़ों की खूबसूरती तक सीमित नहीं था। औपनिवेशिक भारत में शिमला सत्ता, विचार और संवाद का केंद्र था। ब्रिटिश हुकूमत की गर्मियों की राजधानी होने के कारण यहां देश–विदेश के नेता, अफ़सर और बुद्धिजीवी जुटते थे। इसी माहौल में इक़बाल की कविताएं, उनके दर्शन और उनकी राजनीतिक सोच गंभीर बहसों का हिस्सा बनीं।
शिमला और इक़बाल की वैचारिक उड़ान
इक़बाल कैम्ब्रिज, म्यूनिख और हीडलबर्ग की अकादमिक दुनिया से पढ़कर लौटे थे, लेकिन उनकी कविता की आत्मा पूरब की थी। शिमला जैसे शहर में, जहां पश्चिमी आधुनिकता और भारतीय परंपरा आमने–सामने थी, इक़बाल की सोच को खास जगह मिली। उनका संदेश साफ़ था कि ख़ुदी को पहचानो, आत्मसम्मान को जगाओ और गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलो।
‘तराना-ए-हिंदी’ बच्चों के लिए लिखा गया, लेकिन शिमला के स्कूलों, सभाओं और सांस्कृतिक मंचों पर यह राष्ट्रगान जैसा बन गया। देवदारों के बीच गूंजता यह गीत आज भी उस समय की याद दिलाता है, जब राष्ट्रवाद मज़हब से ऊपर था और इंसानियत केंद्र में थी।
विचारों का शहर, विचारों का कवि
शिमला सिर्फ़ अंग्रेज़ हुकूमत का ग्रीष्मकालीन ठिकाना नहीं था। ब्रिटिशकालीन शिमला विचारों की प्रयोगशाला भी था और इक़बाल ऐसे कवि थे, जिनकी नज़र आने वाले कल पर थी। उनका दर्शन आज भी सवाल करता है किक्या हमने अपनी ‘ख़ुदी’ को पहचाना? क्या शिक्षा सिर्फ़ डिग्री है या आत्मनिर्माण है।
आज जब शिमला विरासत, पर्यटन और आधुनिकता के बीच संतुलन खोज रहा है, इक़बाल की सोच और भी प्रासंगिक लगती है कि जड़ों से जुड़े रहो, लेकिन सोच आसमान जितनी ऊंची रखो। इक़बाल भले ही लाहौर में सुपुर्द ए-ख़ाक हुए हों, लेकिन उनकी कविता आज भी हिमालयी हवाओं में ज़िंदा है, ख़ासतौर पर शिमला में, जहां विचारों को हमेशा ऊंचाई मिली है।
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Jyoti maurya

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