पलायन से पहचान तक: ‘पवना हैंडलूम सेंटर’ ने बदली एक परिवार और गांव की तक़दीर

पलायन से पहचान तक: ‘पवना हैंडलूम सेंटर’ ने बदली एक परिवार और गांव की तक़दीर
पलायन से पहचान तक: ‘पवना हैंडलूम सेंटर’ ने बदली एक परिवार और गांव की तक़दीर
विनोद भावुक। शिमला
कभी रोज़गार की तलाश में शहरों की धूल फांकने वाली एक महिला, आज अपने गांव में रहकर सम्मानजनक आजीविका चला रही है और दूसरों के लिए भी उम्मीद बन चुकी है। यह कहानी है मंडी ज़िले के करसाला गांव की पावना कुमारी की, जिन्होंने पवना हैंडलूम सेंटर के ज़रिये आत्मनिर्भरता का नया अध्याय लिखा।
2019 से पहले पवना का जीवन आसान नहीं था। परिवार वर्षा-आधारित खेती पर निर्भर था, जो साल भर का सहारा नहीं बन पाती थी। मौसमी बेरोज़गारी के चलते पवना और उनके पति को मज़दूरी के लिए शहरों की ओर पलायन करना पड़ता था। सालाना आमदनी महज़ ₹50,000—और भविष्य अनिश्चित।
जनवरी 2019 में पावना ने आशा सेल्फ हेल्प ग्रुप जॉइन किया। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत हैंडलूम और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण मिला। यहीं उन्हें समझ आया कि सांस्कृतिक कला को व्यवसाय में बदला जा सकता है।
पवना ने सिर्फ़ बुनना ही नहीं सीखा—उन्होंने बेचना भी सीखा। सोशल मीडिया की ताक़त पहचानी और अपने उत्पादों के लिए ‘नारी शक्ति CLF’ नाम से फेसबुक व इंस्टाग्राम पेज बनाए। नतीजा पट्टू , चप्पलें और फ़्रेम जैसे हैंडलूम उत्पादों की मांग तेज़ी से बढ़ी।
आज पवना की मासिक आय ₹4,000 से बढ़कर ₹10,000 हो चुकी है। पलायन रुक गया है। वे अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा पा रही हैं और भविष्य के लिए बचत भी। पवना अब अपने ब्लॉक में रोल मॉडल हैं, जो अन्य महिलाओं को पलायन छोड़कर स्वरोज़गार अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। पवना कुमारी कहती हैं, अब काम के लिए गांव छोड़ना नहीं पड़ता। आज मैं अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा सकती हूं और भविष्य सुरक्षित कर रही हूं।
पवना हैंडलूम सेंटर की कहानी बताती है कि सही प्रशिक्षण, डिजिटल पहुंच और आत्मविश्वास मिल जाए, तो गांव में रहकर भी सम्मानजनक रोज़गार संभव है। यह सिर्फ़ एक उद्यम नहीं उम्मीद, स्वाभिमान और स्थिर भविष्य की कहानी है।
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Jyoti maurya

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