देश के लिए बेटे का बलिदान, समाज के लिए परिवार का त्याग, देशभक्ति, सामाजिक चेतना और त्याग की एक दुर्लभ मिसाल
देश के लिए बेटे का बलिदान, समाज के लिए परिवार का त्याग, देशभक्ति, सामाजिक चेतना और त्याग की एक दुर्लभ मिसाल
नवल/ बही, बैजनाथ
देश के लिए शहीद होना वीरता है, लेकिन शहीद की स्मृति को समाज के लिए समर्पित कर देना उससे भी बड़ा बलिदान है। कांगड़ा जिला के बैजनाथ क्षेत्र के बही गांव की यह कहानी देशभक्ति, सामाजिक चेतना और त्याग की एक दुर्लभ मिसाल भी है।
बही गांव शहीद मुख्तियार चंद बख्शी का जन्म 14 जुलाई 1948 को हुआ था। उन्होंने 17 अगस्त 1965 को भारतीय सेना में भर्ती होकर देशसेवा का संकल्प लिया। वे 4 डोगरा रेजिमेंट के जांबाज़ सिपाही थे और उन्होंने 6 वर्ष 113 दिन देश की सेवा की।
1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान 7 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के खिलाफ लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए। शहीद मुख्तियार चंद बख्शी को उनकी सेवा और साहस के लिए सैन्य सेवा मेडल, जम्मू-कश्मीर क्लास्प सहित सैन्य सेवा मेडल मिला।
शहादत के बाद बही गांव के लखदाता मेला ग्राउंड (खेल मैदान) की लगभग 20 कनाल भूमि सरकार ने शहीद के नाम पर उनके परिवार को आवंटित की। शहीद के परिजनों ने यह जमीन सामाजिक हित में दान कर कर बड़ा दिल दिखाया।
यह केवल भू दान नहीं था, यह शहादत की भावना को समाज तक पहुंचाने का निर्णय था। ताकि, गांव का खेल मैदान बचा रहे, युवाओं की खेल प्रतियोगिताएं चलती रहें और 200 वर्षों से लगने वाला लखदाता मेला, जो हर साल अप्रैल में लगता है, बिना किसी बाधा के जारी रह सके।
बही गांव केवल एक शहीद का गांव नहीं है। इस गांव के चार सगे भाई-बंधु देश के लिए शहीद हुए हैं।
उन सभी की स्मृति में गांव में शहीद द्वार बनाया गया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां यह न भूलें कि
देशभक्ति किताबों में नहीं, हमारे गांवों की मिट्टी में लिखी जाती है।
शहीद मुख्तियार चंद बख्शी का बलिदान और उनके परिवार का त्याग यह सिखाता है कि देशसेवा केवल सीमा पर ही नहीं, समाज के लिए लिए गए फैसलों में भी होती है। देवभूमि ऐसी वीरभूमि है, जहां की मिट्टी में सर्वस्व होम करने का जज्बा है।
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