शिमला के स्क्वाड्रन लीडर मोहिंदर सिंह पुज्जी, जिन्होंने दस्तार पहन कर था उड़ाया लड़ाकू विमान, लंदन में लगी है कांस्य की प्रतिमा, दूसरे विश्व युद्ध की अमर गाथा

शिमला के स्क्वाड्रन लीडर मोहिंदर सिंह पुज्जी, जिन्होंने दस्तार पहन कर था उड़ाया लड़ाकू विमान, लंदन में लगी है कांस्य की प्रतिमा, दूसरे विश्व युद्ध की अमर गाथा
शिमला के स्क्वाड्रन लीडर मोहिंदर सिंह पुज्जी, जिन्होंने दस्तार पहन कर था उड़ाया लड़ाकू विमान, लंदन में लगी है कांस्य की प्रतिमा, दूसरे विश्व युद्ध की अमर गाथा
विनोद भावुक। शिमला
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आसमान में मौत मंडरा रही थी और ब्रिटेन नाज़ी हमलों से जूझ रहा था, तब शिमला में जन्मा एक सिख युवक अपनी पगड़ी, साहस और कौशल के साथ इतिहास रचने निकल पड़ा।
स्क्वाड्रन लीडर मोहिंदर सिंह पुज्जी रॉयल एयर फोर्स में सेवा देने वाले शुरुआती भारतीय सिख पायलटों में से एक थे। वे उन चुनिंदा भारतीयों में शामिल थे, जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के तीनों प्रमुख युद्ध क्षेत्रों यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और बर्मा में लड़ाई लड़ी।
शिमला में जन्म, आसमान से दोस्ती
मोहिंदर सिंह पुज्जी का जन्म 14 अगस्त 1918 को ब्रिटिश भारत शिमला में हुआ था। उनके पिता सरदार सोहन सिंह पुज्जी स्वास्थ्य एवं शिक्षा विभाग में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा शिमला में हुई। आगे की पढ़ाई लाहौर और बॉम्बे विश्वविद्यालय से हुई। उन्होंने कानून की पढ़ाई की, लेकिन उनका दिल कानून की किताबों में नहीं, आसमान में उड़ते जहाज़ों में बसता था।
1936 में उन्होंने दिल्ली फ्लाइंग क्लब से उड़ान सीखनी शुरू की और 1937 में ‘A’ फ्लाइंग लाइसेंस प्राप्त किया। 1940 में जब जर्मनी के हमले ब्रिटेन को हिला रहे थे, तब मोहिंदर सिंह पुज्जी ने माता-पिता की चिंता के बावजूद रॉयल इंडियन एयर फोर्स में जाने का निर्णय लिया। वे उन 24 भारतीय पायलटों में शामिल थे जिन्हें रॉयल इंडियन एयर फोर्स के लिए चुना गया।
दस्तार पहन कर उड़ाया लड़ाकू विमान
1941 में वे रॉयल इंडियन एयर फोर्स में लड़ाकू विमान उड़ाने का प्रशिक्षण लिया और जल्द ही वे हॉकर हरिकेन लड़ाकू विमान उड़ाते हुए युद्ध में उतर गए। उन्होंने फ्रांस पर बमवर्षक अभियानों की सुरक्षा की और इंग्लिश चैनल के ऊपर हवाई लड़ाइयां लड़ीं। एक बार विमान क्षतिग्रस्त होने के बावजूद उन्होंने समुद्र पार कर इंग्लैंड में सुरक्षित लैंडिंग की।
जापानी सेना के खिलाफ घने जंगलों में टोही उड़ानें भरते रहे और खराब मौसम में भी मिशन पर डटे रहे। जनरल विलियम स्लिम के अनुरोध पर उन्होंने 300 अमेरिकी सैनिकों को खोज निकाल यह उनकी उड़ान कला का शिखर क्षण था। एक सिख पायलट के रूप में मोहिंदर सिंह पुज्जी ने उड़ान के दौरान भी दस्तार (पगड़ी) पहनने पर ज़ोर दिया।
लंदन गज़ट में छपी प्रेरणा की कहानी
दस्तार पहन कर लड़ाकू विमान उड़ाने के लिए उन्होंने खास फ्लाइंग हार्नेस डिज़ाइन किया, हालांकि इससे वे ऑक्सीजन मास्क नहीं पहन सके। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें जीवनभर के लिए फेफड़ों की गंभीर बीमारी हो गई, लेकिन उन्होंने कभी पछतावा नहीं किया।
1945 में जापानी इलाकों के ऊपर साहसिक उड़ानों के लिए उन्हें डिस्टिंगुईशेड फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी)
से सम्मानित किया गया। लंदन गज़ट में प्रकाशित प्रशस्ति में उन्हें साहसी, कुशल और प्रेरणादायक नेतृत्व वाला पायलट बताया गया।
नेहरू और एडविना को करवाई ग्लाइडर उड़ान
मोहिंदर सिंह पुज्जी ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद की असाधारण ज़िंदगी जी। वे भारतीय वायुसेना में एरोड्रोम अधिकारी बने। उन्होंने नेहरू, एडविना माउंटबेटन और आइज़नहावर को ग्लाइडर उड़ान कारवाई। उन्होंने हीथ्रो एयरपोर्ट पर एयर ट्रैफिक कंट्रोलर की जिम्मेवारी निभाने के साथ नस्लवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई।
2014 में ग्रेव्सएंड, लंदन में उनकी कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई, जिस पर लिखा है,’उन सभी को समर्पित, जो दुनिया भर से ब्रिटेन के साथ हर युद्ध में लड़े।‘ मोहिंदर सिंह पुज्जी की कहानी केवल एक पायलट की कहानी नहीं है, यह उस भारतीय योगदान की अनूठी प्रेरककथा है, जिसे इतिहास ने लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया है।
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Jyoti maurya

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