जब नगरकोट के शासक ने की दिल्ली के इलाकों में छापेमारी, तब दिल्ली के सुल्तान फिरोज़ शाह तुगलक ने किया नगरकोट अभियान
जब नगरकोट के शासक ने की दिल्ली के इलाकों में छापेमारी, तब दिल्ली के सुल्तान फिरोज़ शाह तुगलक ने किया नगरकोट अभियान
विनोद भावुक। धर्मशाला
14वीं सदी में कांगड़ा का इलाका नगरकोट के नाम से मशहूर था। नगरकोट किला उस दौर में उत्तर भारत के सबसे मजबूत पहाड़ी दुर्गों में गिना जाता था। यह किला पंजाब से हिमालय की ओर जाने वाले मार्गों का प्रहरी, पहाड़ी रियासतों की शक्ति का प्रतीक और दिल्ली सल्तनत के लिए एक संभावित खतरा था।
इतिहासकारों के अनुसार दिल्ली सल्तनत के सुल्तान फिरोज़ शाह तुगलक को सूचना मिली कि नगरकोट के शासक ने उसके इलाकों में छापेमारी की है। यही बात दिल्ली के सुल्तान अखर गई और दिल्ली सल्तनत को हिमालय की ओर ले आई। नगरकोट दिल्ली सल्तनत और पहाड़ी रियासतों के टकराव का अहम केंद्र बन गया।
नगरकोट अभियान एक खास ऐतिहासिक घटना
जियाउद्दीन बारानी/ समसी सिराज आफ़िफ अपनी पुस्तक ‘तारीख ए फिरोजशाही’ में लिखते हैं कि
दिल्ली का सुल्तान फिरोज़ शाह तुगलक (1351–1388) एक ऐसा शासक था जो एक ओर नहरें, शहर और मदरसे बनवाने के लिए जाना गया, तो दूसरी ओर उसकी सेनाएं हिमालय तक पहुंची। दिल्ली से हिमालय तक का फिरोज़ शाह का नगरकोट अभियान एक खास ऐतिहासिक घटना थी।
लगभग 1360 ई. के आसपास फिरोज़ शाह तुगलक ने अपनी सेना के साथ सरहिंद होते हुए पहाड़ी रास्तों से नगरकोट की ओर कूच किया। नगरकोट किले की भौगोलिक स्थिति इतनी मजबूत थी कि सीधा युद्ध आसान नहीं था। इसलिए फिरोज़ शाह ने लंबी घेराबंदी की नीति अपनाई। करीब 6 महीने की घेराबंदी के बाद आख़िरकार कांगड़ा के शासक को समर्पण करना पड़ा।
सत्ता से ज़्यादा ज़रूरी संतुलन
उपेंद्र सिंह की पुस्तक, ‘ए हिस्टरी ऑफएन्सिएंट एंड अर्ली मेडिवल इंडिया’ में लिखते हैं कि दिलचस्प बात यह रही कि फिरोज़ शाह ने नगरकोट को सीधे दिल्ली सल्तनत में नहीं मिलाया, बल्कि शासक को अपने अधीन शासक (फ्यूडटरी) के रूप में बनाए रखा। यह कदम बताता है कि कांगड़ा जैसे पहाड़ी क्षेत्र को दिल्ली से सीधे नियंत्रित करना व्यावहारिक नहीं था। यहां सत्ता से ज़्यादा संतुलन ज़रूरी था।
इतिहासकार आर सी मजूमदार की पुस्तक ‘द दिल्ली सल्तनत’ के मुताबिक दिल्ली सल्तनत के साथ नूरपुर रियासत के बेहतर रिश्ते थे। फिरोज़ शाह के समय नूरपुर राज्य (आज का नूरपुर पठानकोट क्षेत्र) के राजा कैलाश पाल दिल्ली सल्तनत के सहयोगी माने जाते थे। यही वजह है कि इस क्षेत्र में सेना, राजनीति और जल-प्रबंधन तीनों का असर दिखता है।
मध्यकालीन भारतीय राजनीति का अहम हिस्सा रहा कांगड़ा
फिरोज़ शाह तुगलक का नगरकोट अभियान इस बात की गवाही देता है कि कांगड़ा की पहाड़ियां कभी ‘हाशिये का क्षेत्र नहीं थीं। तब का कांगड़ा मध्यकालीन भारतीय राजनीति का अहम हिस्सा रहा है। कांगड़ा केवल युद्ध का मैदान नहीं था, बल्कि दिल्ली और पहाड़ों के बीच सत्ता-संतुलन की प्रयोगशाला था। फिरोज़ शाह तुगलक ने यहां सियासी प्रयोग किया था।
आज जब कांगड़ा को हम संस्कृति, पर्यटन और विरासत के रूप में देखते हैं, तब यह इतिहास याद दिलाता है कि यह इलाका सदियों से रणनीतिक और राजनीतिक रूप से अहम रहा है और कांगड़ा की पहाड़ियों में सिर्फ प्राकृतिक खूबसूरती भर नहीं हैं, इतिहास में कांगड़ा की ऐतिहासिक उंचाइयां भी दर्ज हैं, नगरकोट के नाम से।
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