लाहौल–स्पीति की चट्टानें सुनातीं स्टोलिच्का की कहानी, विज्ञान के लिए हिमालय में जान देने वाला विदेशी विज्ञानी
लाहौल–स्पीति की चट्टानें सुनातीं स्टोलिच्का की कहानी, विज्ञान के लिए हिमालय में जान देने वाला विदेशी विज्ञानी
विनोद भावुक। केलंग
लाहौल–स्पीति की ऊंची- ऊंची घाटियां आज भले ही पर्यटन और रोमांच के लिए जानी जाती हों, लेकिन उन्नीसवीं सदी में यही इलाका वैज्ञानिक खोजों की प्रयोगशाला था। इन्हीं दुर्गम पहाड़ों में एक ऐसा विदेशी वैज्ञानिक आया, जिसने हिमालय को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि समझा, दर्ज किया और विज्ञान की भाषा दी। उस वैज्ञानिक का नाम था फर्डिनेंड स्टोलिच्का।
1860 के दशक में जब हिमालय वैज्ञानिकों के लिए लगभग अज्ञात था, तब स्टोलिच्का ने लाहौल–स्पीति और पश्चिमी हिमालय की भू-रचना, जीव-जंतु और जीवाश्मों का गहन अध्ययन किया। स्पीति के मुड मड़ गांव में उन्होंने जिस भू-परत की पहचान की, वह आज भी भू-विज्ञान में एक अहम संदर्भ मानी जाती है।
हिमालय के कई जीवों के नामों में अमर
स्टोलिच्का सिर्फ भूवैज्ञानिक नहीं थे। वे जीवाश्म विज्ञान, पक्षी विज्ञान, सरीसृप व उभयचर अध्ययन और
मोलस्क व कीट विज्ञान जैसे कई क्षेत्रों में सक्रिय रहे। लाहौल–स्पीति और आसपास के हिमालयी इलाकों से जुड़े कई जीवों और प्रजातियों के नाम आज भी उनके नाम पर हैं, जो इस क्षेत्र में उनके योगदान को अमर बनाते हैं। जियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की आर्काइव में स्टोलिच्का का काम दर्ज है।
1873–74 में ब्रिटिश सरकार के सेकेंड यारकंद मिशन के दौरान स्टोलिच्का फिर हिमालय लौटे। यह मिशन ‘ग्रेट गेम’ के दौर में सामरिक दृष्टि से अहम था, लेकिन 5,000 मीटर से अधिक ऊंचाई, अत्यधिक परिश्रम और कठिन मौसम ने उनके शरीर को तोड़ दिया। 19 जून 1874, में लाहौल–स्पीति से जुड़ी हिमालयी यात्रा के दौरान लद्दाख के मुरगो में उनकी मृत्यु हो गई।
लाहौल–स्पीति की भूगर्भीय समझ को मिला वैश्विक मंच
स्टोलिच्का की जहां मौत हुई थी, आज उस स्थान को पर्वतारोही ‘एक्यूट माउंटेन सिकनेस’ मानते हैं। लेह के कब्रिस्तान में बना उनका स्मारक आज भी याद दिलाता है कि विज्ञान के लिए हिमालय में जान देने वाला यह व्यक्ति, लाहौल–स्पीति की चट्टानों और घाटियों में आज भी जीवित है। मशहूर पर्वतारोही हरीश कपाड़िया ने 2005 में प्रकाशित‘ इंटू द अनट्रेव्ल्ड हिमालय’ में उनके काम को याद किया है।
स्टोलिच्का लाहौल के लिए इसलिए खास हैं क्योंकि उनके प्रयासों से लाहौल–स्पीति की भूगर्भीय समझ को वैश्विक मंच मिला, हिमालयी जीव-जंतुओं का पहला व्यवस्थित वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण हुआ और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की नींव को मजबूती मिली। आज जब हम लाहौल–स्पीति को सिर्फ पर्यटन के चश्मे से देखते हैं, तब स्टोलिच्का याद दिलाते हैं कि यह इलाका ज्ञान, विज्ञान और खोज की धरती भी रहा है।
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