राजकुमारी बांबा : लंदन से लौटकर पंजाब की राजकुमारी ने शिमला में आजादी के विचारों को दी धार, भारत विभाजन को नकारते हुए लाहौर छोड़ने से किया इनकार

राजकुमारी बांबा : लंदन से लौटकर पंजाब की राजकुमारी ने शिमला में आजादी के विचारों को दी धार, भारत विभाजन को नकारते हुए लाहौर छोड़ने से किया इनकार
राजकुमारी बांबा : लंदन से लौटकर पंजाब की राजकुमारी ने शिमला में आजादी के विचारों को दी धार, भारत विभाजन को नकारते हुए लाहौर छोड़ने से किया इनकार
विनोद भावुक। शिमला
पंजाब के सिख राजवंश की अंतिम उत्तराधिकारी, आज़ादी की समर्थक और महिला अधिकारों की पैरोकार राजकुमारी बांबा दिलीप सिंह (बांबा सदरलैंड) की ज़िंदगी का शिमला अहम पड़ाव रहा है। पंजाब के अंतिम महाराजा महाराजा दिलीप सिंह की बेटी, महारानी जिंद कौर की पोती और महाराजा रणजीत सिंह की वंशज राजकुमारी बांबा जब ब्रिटेन से भारत लौटी, तब तक पंजाब अंग्रेज़ों के कब्ज़े में जा चुका था, सिंहासन छिन चुका था, लेकिन इतिहास और आत्मसम्मान अब भी जीवित था।
शिमला में मजबूत की आजादी की सोच
बांबा ने ठीक उसी तरह, जैसे कभी सिख दरबार करता था, लाहौर को सर्दियों की राजधानी और शिमला को गर्मियों का ठिकाना बनाया। शिमला में रहते हुए बांबा ने ब्रिटिश अफसरशाही को बहुत नज़दीक से देखा, स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों से संवाद बढ़ाया और यह महसूस किया कि अंग्रेज़ी सत्ता का असली चेहरा क्या है। शिमला जहां अंग्रेज़ सत्ता के गलियारों में बैठते थे, वहीं एक निर्वासित राजकुमारी आजादी की सोच को मजबूत कर रही थी।
शिमला की सोच पर लाहौर में अमल
लाहौर फोर्ट आर्काइव में मौजूद दस्तावेज़ बताते हैं कि राजकुमारी बांबा की यह कहानी सिर्फ एक राजकुमारी की कहानी नहीं है, बल्कि एक निर्वासित साम्राज्य, टूटे हुए सिंहासन और आज़ादी की जिद की सत्यकथा है। राजकुमारी बांबा का जन्म 29 सितंबर 1869 को लंदन में हुआ। वे पंजाब के निर्वासित राजपरिवार की बेटी थी। लाहौर स्थित उनके घर ‘गुलज़ार’ में लाला लाजपत राय सहित कई स्वतंत्रता सेनानी अक्सर जुटते थे, जिसकी ज़मीन शिमला में तैयार हुई थी, जहां उन्होंने देखा कि जो शासन खुद को सभ्य कहता है, वह दूसरों की जड़ों को कैसे काटता है।
‘जिस धरती पर मेरे पूर्वजों की राख है, वही मेरा देश’
बांबा सदरलैंड केवल राजकुमारी नहीं थीं। वे महिला मताधिकार आंदोलन से जुड़ी रहीं, भारत के स्वशासन की समर्थक थीं। भारत विभाजन को नकारते हुए लाहौर छोड़ने से इनकार कर दिया उनका मानना था। उन्होंने कहा था कि जिस धरती पर मेरे पूर्वजों की राख है, वही मेरा देश है। जब 1957 में लाहौर में उनका निधन हुआ, तब भारत और पाकिस्तान बंट चुके थे और उनके अधिकतर रिश्तेदार भारत आ चुके थे, लेकिन बांबा ने लाहौर और अपनी मिट्टी नहीं छोड़ी। उनकी कब्र पर लिखा फ़ारसी शेर आज भी गूंजता है: ‘कब्र खुल जाए तो कोई अमीर-गरीब में फर्क न कर सके।‘
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Jyoti maurya

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