शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में आज भी जिंदा है अंग्रेजों के जमाने का ‘छोटा हाज़िरी’, सूरज निकालने से पहले शिमला में लिया जाने वाला हल्का भोजन
शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में आज भी जिंदा है अंग्रेजों के जमाने का ‘छोटा हाज़िरी’, सूरज निकालने से पहले शिमला में लिया जाने वाला हल्का भोजन
विनोद भावुक। शिमला
शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में हर सुबह लगभग छह बजे दूध या चाय और बिस्कुट ’छोटा हाज़िरी’ नाम से परोसे जाते हैं। ब्रिटिशकालीन इस स्कूल में ’छोटा हाज़िरी’ शब्द किताबों से निकलकर परंपरा बन चुका है। ब्रिटिश राज के दौरान शिमला में ’छोटा हाज़िरी’ सरकारी बंगलों से निकाल कर शहर की दिनचर्या में घुल-मिल गया था।
शिमला की स्मृतियों में ऐसी सुबह भी दर्ज है, जब दिन की शुरुआत किसी अलार्म से नहीं, बल्कि ‘छोटा हाज़िरी’ से होती थी। यह न पूरी चाय थी, न पूरा नाश्ता, बल्कि शिमला के मिज़ाज के अनुरूप, ठंडी हवा में लिया गया दिन का पहला, हल्का और सधा हुआ आहार। ‘छोटा हाज़िरी’ छोटा यानी हल्का और हाज़िरी यानी उपस्थित होना। अर्थात, दिन की पहली हल्की उपस्थिति।
रूस- यूरोप तक ‘छोटा हाजिरी’ का जिक्र
डेविड गिलमौर अपनी पुस्तक The Ruling Caste: Imperial Lives in the Victorian Raj में लिखते हैं कि ब्रिटिश काल में यह सूरज निकलने से पहले लिया जाने वाला हल्का भोजन था। अफ़सरों को परेड या सैर पर जाने से पहले चाय या गर्म दूध, बिस्कुट और कभी-कभी फल परोसे जाते थे। 1891 में भारत आईं रूसी राजकुमारी ओल्गा श्चेरबातोवा ने सुबह की पहली चाय-बिस्कुट को ‘छोटा हाजरी’ लिखा है।
1912 में महान खोजकर्ता ऑरेल स्टीन ने मध्य एशिया अभियान के दौरान रात 11:30 बजे उठकर ‘छोटा हाज़िरी’ कर काम पर निकलने का उल्लेख किया है। जिम कॉर्बेट ने रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए की सत्यकथा में अंधेरे में ‘छोटा हाज़िरी’ करते समय सुनी आवाज़ों का ज़िक्र किया। इन प्रसंगों से साफ है कि छोटा हाज़िरी सिर्फ़ भोजन नहीं, बल्कि दिन के आरंभ की घोषणा थी।
भाषा से राजनीति तक का सफ़र
रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक India After Gandhi में बताते हैं कि 1947 में रियासतों के विलय के समय अख़बारों में एक व्यंग्यात्मक पंक्ति छपी, ‘छोटा हाज़िरी मर्ज्ड’। यहां ‘छोटा हाज़िरी’ एक छोटी रियासत के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल हुआ। यह शब्द जीवनशैली से निकलकर राजनीति तक पहुंच गया। शिमला के पुराने स्कूलों, कुछ आर्मी रेजिमेंट्स, एंग्लो-इंडियन परिवारों में ‘छोटा हाज़िरी’ अब भी सांस ले रहा है।
‘छोटा हाज़िरी’ शिमला के स्वभाव जैसा ही संयमित, ठंडा, सधा हुआ और गरिमापूर्ण है। ‘छोटा हाज़िरी’ की सीख है कि दिन की शुरुआत शोर से नहीं, संस्कार और संतुलन से हो। आज भी जब शिमला के किसी पुराने स्कूल में सुबह-सुबह दूध और बिस्कुट मिलते हैं, तो इतिहास चुपचाप मुस्कुरा देता है।
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