अंग्रेज़ वास्तुकार हेनरी इरविन के हुनर का कमाल, शिमला का ‘वायसरॉयल लॉज’ और गेयटी थियेटर बेमिसाल

अंग्रेज़ वास्तुकार हेनरी इरविन के हुनर का कमाल, शिमला का ‘वायसरॉयल लॉज’ और गेयटी थियेटर बेमिसाल
अंग्रेज़ वास्तुकार हेनरी इरविन के हुनर का कमाल, शिमला का ‘वायसरॉयल लॉज’ और गेयटी थियेटर बेमिसाल
विनोद भावुक। शिमला
वायसरॉयल लॉज और गेयटी थियेटर ब्रिटिशकालीन शिमला की दो ऐसी इमारतें हैं, जो दिखने में राजसी और तकनीकी रूप से आधुनिक हैं। ये भव्य इमारतें स्थापत्य कला के अद्भुत नमूने हैं। इन इमारतों को भारत के पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट काम कर रहे हेनरी इरविन ने डिज़ाइन किया था। 19वीं सदी में ब्रिटिश भारत के इस प्रसिद्ध वास्तुकार ने शिमला को केवल एक हिल स्टेशन नहीं, बल्कि इंडो-सरैसेनिक स्थापत्य की खुली पाठशाला में बदल दिया।
हेनरी इरविन ने पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट में रहते हुए भारत भर में कई ऐतिहासिक इमारतें डिजाइन कीं, लेकिन शिमला उनके काम का मुकुटमणि बन गया। जब हम वायसरॉय लॉज या गेयटी थियेटर देखते हैं, तो दरअसल हम इरविन की सोच, दृष्टि और सौंदर्यबोध को महसूस कर रहे होते हैं। यह सच भी मुखर होता है कि वास्तुकला सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि समय के साथ चलने वाली स्मृति होती है।
ऑब्ज़र्वेटरी हिल पर वायसरॉयल लॉज
1880 में शिमला के ऑब्ज़र्वेटरी हिल पर ब्रिटिश भारत के वायसराय के लिए एक इमारत की परिकल्पना हुई। इरविन ने इसका डिज़ाइन खास रूप से जेकोबिथन शैली में किया, जो इंग्लिश रैनेसान्स और स्कॉटिश किलों से प्रेरित थी। इसका मक़सद पहाड़ की चोटी पर ऐसी इमारत खड़ी करना था, जो दूर से भी दिखाई दे और ब्रिटिश साम्राज्य की प्रतिष्ठा की मिसाल बने।
उन दिनों पहाड़ पर इमारतें बनाना आसान नहीं था, बावजूद इसके इरविन ने वायसरॉयल लॉज की भव्यता और टेक्नोलॉजी दोनों पर विशेष ध्यान दिया। जब आसपास की अधिकांश इमारतों में रोशनी के लिए तेल के लैंप प्रयोग हो रहे थे, उसी दौर में 1888 में वायसरॉयल लॉज में बिजली का प्रबंध कर दिया गया था। यह शिमला में पहली इमारत थी, जिसमें बिजली की व्यवस्था थी।
राष्ट्रपति निवास से अध्ययन संस्थान तक
वायसरॉयल लॉज के अंदर फायर-फाइटिंग सिस्टम, गर्म और ठंडे पानी की व्यवस्था और औद्योगिक तकनीकें भी शामिल थीं, जो उस युग की कल्पना से भी आगे थीं। सरकारी बैठकों और सिमला सम्मेलन जैसी ऐतिहासिक वार्ताओं का मंच यह वायसरॉयल लॉज रहा है। इस इमारत में 1945 में सिमला कांफ्रेंस हुई। आज़ादी के समय के यह इमारत कई निर्णयों की पृष्ठभूमि में रही।
स्वतंत्रता के बाद यह इमारत भारत सरकार के पास आई और राष्ट्रपति निवास के नाम से प्रसिद्ध हुई।1965 में, तर्कपूर्ण निर्णय के रूप में इसे भारतीय अध्ययन संस्थान के लिए समर्पित किया गया, जहां आज विद्वान शोध, शिक्षा और मानविकी के विषयों पर कार्य करते हैं। दुनिया भर के विद्वान भारतीय अध्ययन संस्थान शिमला से जुडने को अपनी शान समझते हैं।
रिज की शोभा बढ़ाता गेयटी थियेटर
शिमला का गेयटी थियेटर भी हेनरी इरविन की ही देन है। 1887 में बना यह थियेटर आज भी शहर की सांस्कृतिक धड़कन माना जाता है। यहीं से शिमला में नाटक, संगीत और सामाजिक गतिविधियों को एक नया मंच मिला। यह इमारत बताती है कि इरविन सिर्फ सत्ता के लिए नहीं, बल्कि जन-संस्कृति के लिए भी वास्तुकला रचते थे। गेयटी थियेटर तकनीकी विशेषज्ञता, वास्तुकला का समन्वय और इतिहास की गूंज को भी संजोये हुए है।
24 जनवरी 1841 को जन्मे हेनरी इरविन ऐसे वास्तुकार थे, जिसने शिमला को नई पहचान दी। साल 1888 में उन्हें सीआईई सम्मान मिला। 5 अगस्त 1922 को उनका निधन हो गया। हेनरी इरविन को इस दुनिया को अलविदा कहे एक सदी से ज्यादा का वक्त बीत चुका लेकिन शिमला में उनकी बनाई इमारतें आज भी खड़ी हैं। आज भी देश-विदेश के पर्यटकों, शोधार्थियों और कला-प्रेमियों को शिमला की ये दोनों इमारतें आकर्षित कर रही हैं।
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Jyoti maurya

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