लंदन से कटघरे में खड़ी कर दी शिमला की सत्ता, जोसेफिन बटलर ने ब्रिटिश हुकूमत में लड़ी भारतीय महिलाओं के सम्मान की लड़ाई

लंदन से कटघरे में खड़ी कर दी शिमला की सत्ता, जोसेफिन बटलर ने ब्रिटिश हुकूमत में लड़ी भारतीय महिलाओं के सम्मान की लड़ाई
लंदन से कटघरे में खड़ी कर दी शिमला की सत्ता, जोसेफिन बटलर ने ब्रिटिश हुकूमत में लड़ी भारतीय महिलाओं के सम्मान की लड़ाई
विनोद भावुक। शिमला
उन्नीसवीं सदी के अंत में ब्रिटिश सरकार ने भारत में संक्रामक रोग अधिनियम को लागू किया। इस क़ानून के तहत ब्रिटिश छावनियों के आसपास रहने वाली भारतीय महिलाओं को जबरन मेडिकल जांच के लिए मजबूर किया जाता था। इन आदेशों की फ़ाइलें और नीतिगत फैसले शिमला से जारी होते थे, क्योंकि शिमला ब्रिटिश सरकार की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी।
संक्रामक रोग अधिनियम का सीधा असर भारत की महिलाओं पर होता था। इस क़ानून के ख़िलाफ़ इंग्लैंड में जोसेफिन एलिज़ाबेथ बटलर बुलंद आवाज़ मुखर की। जोसेफिन बटलर ने इन क़ानूनों को महिलाओं के सम्मान और स्वतंत्रता पर हमला कहते हुए कहा कि भारत में ब्रिटिश शासन महिलाओं को बीमारियों का स्रोत मानकर अमानवीय व्यवहार कर रहा है।
ब्रिटिश संसद में हुई बहस हुई, रद्द हुआ कानून
जोसेफिन बटलर की पैरवी के बाद ब्रिटिश शिमला की नीतियों पर ब्रिटिश संसद में हंगामा हुआ। बटलर के अभियान का असर इतना गहरा हुआ कि ब्रिटिश संसद में भारतीय छावनी क़ानून पर बहस हुई। शिमला से जारी सैन्य आदेशों को सार्वजनिक रूप से शर्मनाक कहा गया।1888 में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स को मजबूर होकर भारत में इस क़ानून को रद्द करने का प्रस्ताव पास करना पड़ा।
यह पहला मौका था जब ब्रिटिश शिमला से लागू किसी औपनिवेशिक नीति को इंग्लैंड की एक महिला सुधारक के दबाव में वापस लिया गया। जोसेफिन बटलर कभी शिमला नहीं आईं, लेकिन शिमला में बैठी सत्ता उनकी वजह से कटघरे में खड़ी हुई। भारतीय महिलाओं के सम्मान का सवाल पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठा और ब्रिटिश नारीवादी आंदोलन का असर औपनिवेशिक भारत तक पहुंचा।
इसलिए ज़रूरी बटलर को याद करना
जोसेफिन बटलर की कहानी बताती है कि शिमला केवल हुकूमत की नगरी नहीं थी, यहां से जारी फ़ैसले मानवाधिकारों को भी प्रभावित करते थे। इस कहानी का दूसरा संदेश यह है कि कभी-कभी एक महिला की नैतिक ताक़त साम्राज्य की दीवारों को हिला देती है। ‘जोसेफिन बटलर: हर वर्क एंड प्रिंसिपल्स’ में हेलेन मैथर्स ने उनके योगदान की विस्तार से प्रकाशित किया है।
जोसेफिन बटलर शिमला की गलियों में नहीं चलीं, लेकिन लंदन से ही उनकी आवाज़ ने शिमला के सचिवालयों में खलबली मचा दी। शिमला के औपनिवेशिक अतीत को देखते हुए यह याद रखना ज़रूरी है कि उस इतिहास में एक ब्रिटिश महिला ने भारतीय महिलाओं के पक्ष में खड़े होकर सत्ता को चुनौती दी थी और फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया था।
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Jyoti maurya

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