न मिली कोई दिल की रानी, न शिमला में बगीचे के तालाब में भरा पानी, भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ लॉर्ड किचनर की अनसुनी कहानी

न मिली कोई दिल की रानी, न शिमला में बगीचे के तालाब में भरा पानी, भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ लॉर्ड किचनर की अनसुनी कहानी
न मिली कोई दिल की रानी, न शिमला में बगीचे के तालाब में भरा पानी, भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ लॉर्ड किचनर की अनसुनी कहानी
विनोद भावुक। शिमला
ब्रिटिशराज के दौरान भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ होरेशियो हर्बर्ट लॉर्ड किचनर का शिमला का सात साल का कार्यकाल उनकी सत्ता, सनक, अनुशासन और अजीब फैसले लेने के लिए सुर्खियों में रहा था। सेना के शीर्ष पद पर पहुंचने के बावजूद लॉर्ड किचनर को न तो उनके सपनों की रानी मिली और न ही उनके बगीचे में पानी का प्रबंध हो पाया।
इतिहासकारों ने लिखा है कि दो चीज़ें थीं जिन्होंने लॉर्ड किचनर को मात दी। हर्मियोनी बेकर उनका पहला प्रेम थी, लेकिन वे एक दूसरे के नहीं हो सके। बाद में शादी के लिए मैरी हेलन थेरेसा, कैथरीन ‘स्किटल्स’ वाल्टर्स जैसी युवतियों के कई रिश्ते आए, लेकिन वे किसी से विवाह नहीं कर सके। वे अपने सरकारी आवास ‘स्नोडन’ के बगीचे में तालाब बनाना चाहते थे, जो नहीं बना पाये।
भैंसे की मौत, बैल को निमोनिया
1902 में जब लॉर्ड किचनर भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ बनकर शिमला पहुँचे, तो उनके बारे में कहा जाता था कि वे कुर्सी पर ऐसे बैठते हैं, मानो सिंहासन पर बैठे हो। हल्की भेंगापन लिए उनकी नीली आंखें इतनी पैनी मानी जाती थीं कि सामने खड़ा व्यक्ति खुद को कठघरे में महसूस करता था। ‘स्नोडन’ उनका आधिकारिक निवास था, जिसे उन्होंने एक भव्य महल में बदल दिया था।
लॉर्ड किचनर को असंभव शब्द पसंद नहीं था। ‘स्नोडन’ के बगीचे में तालाब खुदवाने के लिए भैंसे बुलवाए गए। तालाब खोदने के लिए मिट्टी रौंदी गई। तालाब बनाने की इस कवायद में जब भैंसे की मौत हो गई तो इस काम के लिए बैल लाए गए, पर सर्दी में उन्हें भी निमोनिया हो गया। आखिरकार, ‘स्नोडन’ को बिना तालाब के ही रहना पड़ा।
वाइल्ड फ्लावर लॉर्ड किचनर सुइट
1902 से 1909 तक किचनर शिमला में रहे। यही वह दौर था जब उनका टकराव तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्ज़न से हुआ। दोनों की सोच, अहंकार और अधिकार की परिभाषा अलग-अलग थी। इस टकराव का नतीजा यह हुआ कि लंदन तक लॉर्ड कर्ज़न की राय भारी पड़ी और किचनर वायसराय बनने का सपना देखते ही रह गए।
शिमला में आधिकारिक आवास होने के बावजूद हर्बर्ट किचनर ने 23 एकड़ में फैली कोठी ‘वाइल्ड फ्लावर’ लीज़ पर लिया था। यहां उन्हें बागवानी करने से सुकून मिलता था।1909 में वाइल्ड फ्लावर बिक गया। 1925 में वहां तीन मंज़िला होटल बना। 1990 के दशक में इसमें आग लगी। बाद में ओबेरॉय समूह ने वहां नया होटल बनाया, जिसकी एक सुइट आज भी लॉर्ड किचनर के नाम से जानी जाती है।
सनक के कई किस्से
लॉर्ड किचनर की सनक भी कई किस्से हैं। एक इंजीनियर ने दिन-रात काम कर पुल का काम पूरा किया, लेकिन पुल निर्धारित समय पर नहीं बन पाया। इंजीनियर के तर्क को अनसुना करते हुये निरीक्षण के समय किचनर ने सिर्फ़ इतना कहा कि पुल तो बन गया, लेकिन तुम्हें मेरे सामने बिना दाढ़ी बनाए नहीं आना चाहिए था।
लॉर्ड किचनर के बारे में एक और किस्सा मशहूर है। उनके बारे में कहा जाता है कि गुस्सा हमेशा उनकी नाक पर रहता था। एक बार तो सरकारी फाइलों से नाराज़ होकर उन्होंने ऐसा आदेश दिया था कि सुन कर सब दंग रह गए थे। उन्होंने कहा था कि सैन्य विभाग की फाइलें पीसकर ‘स्नोडन’ के नए डाइनिंग हॉल की छत की सजावट में इस्तेमाल की जाएं।
पोस्टर बॉय का समंदर में अंत
‘यूअर कंट्री नीड्स यू’ पोस्टर पहले विश्व युद्ध के दौरान दुनिया भर में मशहूर हुआ था, जिसने विश्वयुद्ध में देशभक्ति की लहर पैदा की थी। यह पोस्टर सिर्फ़ एक चित्र नहीं था, यह किचनर की उस छवि का विस्तार था जो पहले ही बन चुकी थी। पहले विश्व युद्ध से पहले लॉर्ड किचनर सूडान में दो साल लंबी लड़ाई जीतकर खार्तूम के नायक बन चुके थे। उनकी ख्याति उनसे तेज़ चलती थी।
वे शिमला को किताबें, तलवारें, चीनी मिट्टी के बर्तन और अनगिनत पौधे दे गए, बदले में संजौली-ढली सुरंग में हुए एक हादसे के कारण वे शिमला से स्थाई लंगड़ाहट ले गए।1916 में लॉर्ड किचनर का अंत भी उतना ही नाटकीय था, जितना नाटकीय उनका जीवन रहा था। उनका जहाज़ ‘एचएमएस हैम्शायर’ एक जर्मन बारूदी सुरंग से टकराया और वे समुद्र में डूब गए।
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Jyoti maurya

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