मार्को पैलिस: एक विदेशी साधक जिसने हिमालय को अपना आध्यात्मिक घर बना लिया, धर्म का अध्ययन नहीं किया, मठों में रहकर और दीक्षा लेकर जिया

मार्को पैलिस: एक विदेशी साधक जिसने हिमालय को अपना आध्यात्मिक घर बना लिया, धर्म का अध्ययन नहीं किया, मठों में रहकर और दीक्षा लेकर जिया
मार्को पैलिस: एक विदेशी साधक जिसने हिमालय को अपना आध्यात्मिक घर बना लिया, धर्म का अध्ययन नहीं किया, मठों में रहकर और दीक्षा लेकर जिया
विनोद भावुक। शिमला
1930 के दशक में जब पश्चिमी साधक मार्को पैलिस तिब्बत और पश्चिमी हिमालय की यात्राओं पर थे, उस समय किन्नौर, स्पीति और लद्दाख जैसे क्षेत्र तिब्बती बौद्ध परंपरा के जीवंत केंद्र थे। पैलिस ने जिन दुर्गम घाटियों, मठों और साधकों का वर्णन किया है, उनमें किन्नौर की भौगोलिक और सांस्कृतिक आत्मा स्पष्ट झलकती है, जहां भारतीय और तिब्बती सभ्यताएं एक-दूसरे में घुलती हैं।
मार्को पैलिस की 1939 में प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तक ‘पीक्स एंड लामास’ (Peaks and Lamas) में हिमालय का वर्णन एक ऐसे आध्यात्मिक लोक का है, जैसा आज भी किन्नौर के मठों और गांवों में महसूस किया जा सकता है। मार्को पैलिस ने पश्चिमी विद्वान की तरह बौद्ध धर्म का अध्ययन नहीं किया, बल्कि मठों में रहकर, लामाओं से सीधे दीक्षा लेकर उसे जिया।
युद्ध से हिमालय तक का सफर
1895 में इंग्लैंड के लिवरपूल में जन्मे मार्को पैलिस सैनिक, संगीतज्ञ, पर्वतारोही, लेखक और बौद्ध चिंतक थे। प्रथम विश्व युद्ध में घायल होने के बाद उनका जीवन भौतिक संघर्ष से हटकर आत्मिक खोज की ओर मुड़ गया। युद्ध के बाद उनका झुकाव पहाड़ों की ओर हुआ और यही झुकाव उन्हें तिब्बत, किन्नौर और स्पीति क्षेत्र तक ले आया।
1936 से वे बौद्ध साधक थे और 1947 में तिब्बत की अंतिम यात्रा के दौरान उन्हें विधिवत दीक्षा मिली, जिसके बाद उनका नाम थुबतेन तेनज़िन पड़ा। किन्नौर में उस समय विदेशी साधकों का स्थानीय मठों में ठहरना यह सामान्य था। पैलिस इसी परंपरा का हिस्सा थे। वे एक असाधारण व्यक्तित्व थे, जिन्होंने हिमालय को आध्यात्मिक चेतना के रूप में देखा।
किन्नौर – तिब्बत का सांस्कृतिक पुल
1947 के बाद पैलिस कालिम्पोंग में रहने लगे, जो उस दौर में किन्नौर–तिब्बत मार्ग से जुड़े बौद्ध शरणार्थियों, विद्वानों और साधकों का प्रमुख केंद्र था। यहीं से उन्होंने तिब्बती संस्कृति के विनाश के विरुद्ध लेखन किया और दुनिया को यह समझाने का प्रयास किया कि हिमालयी क्षेत्र केवल भूगोल नहीं, बल्कि जीवित परंपरा हैं।1960 में उनकी पुस्तक ‘द वे टू द माउंटेन’ प्रकाशित हुई।
पैलिस का मानना था कि किन्नौर और तिब्बत जैसे क्षेत्रों की आधुनिकता यदि परंपरा से कट जाए, तो वह विनाशकारी बन जाती है। उन्होंने तिब्बती भाषा में पुस्तक लिखकर आने वाले खतरे की चेतावनी दी, जो आज भी प्रासंगिक लगती है। मार्को पैलिस 1989 में दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनका लेखन किन्नौर, स्पीति और तिब्बती संस्कृति को समझने की एक ईमानदार खिड़की है।
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Jyoti maurya

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