हिमालयी लोकबुद्धि से वैश्विक विरासत तक : कांगड़ा की लोककथा, ‘सात माताओं का बेटा’, जिसने दुनिया घूम ली

हिमालयी लोकबुद्धि से वैश्विक विरासत तक : कांगड़ा की लोककथा, ‘सात माताओं का बेटा’, जिसने दुनिया घूम ली
हिमालयी लोकबुद्धि से वैश्विक विरासत तक : कांगड़ा की लोककथा, ‘सात माताओं का बेटा’, जिसने दुनिया घूम ली
विनोद भावुक। धर्मशाला
‘कणकां बाईयां, कथां आईयां, कणकां निसरियां, कथां बिसरियां’ धौलाधार की गोद में बसे कांगड़ा की लोकोक्त्ति का अर्थ यह है कि यह जनपद अपनी गहरी लोककथा परंपरा के लिए जाना जाता है। कांगड़ा की इन्हीं लोककथाओं में एक अत्यंत प्रेरक, रोमांचक और ज्ञानवर्धक कथा है, ‘सात माताओं का बेटा’। कांगड़ा की यह लोककथा न सिर्फ़ भारत, बल्कि विश्व लोककथा मानचित्र पर अपनी मौजूदगी दर्ज कर चुकी है।
अमेरिका आधारित भारतीय मूल की लोकविद्वान किरिन नारायण ने कांगड़ा क्षेत्र से संकलित एक रूपांतर को अपनी पुस्तक ‘मंडे ऑन द डार्क नाइट ऑफ द मून- हिमालयन फुटहिल फोकटेल्स’ में दर्ज किया। यही वह कड़ी है, जो इस कथा को कांगड़ा की लोकस्मृति से जोड़ती है। इस लोककथा के रूपांतर ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, तुर्की, फ़िलिस्तीन, उत्तरी अफ़्रीका, स्पेन, चिली और फ्रेंच-कनाडा तक मिलते हैं।
कांगड़ा से दुनिया भर में पहुंची लोककथा
अंतरराष्ट्रीय आर्ने- थॉम्पसन- उथर इंडेक्स में यह कथा, ‘द आउटकास्ट क्वींस एंड द ओर्गेस क्वीन’ शीर्ष से एटीयू 462 के रूप में वर्गीकृत है। फ़िनिश स्कॉलर एंट्टी आर्ने ने 1910 में पहला बड़ा टेल-टाइप इंडेक्स बनाया था। बाद में स्टिथ थॉम्पसन और फिर हैंस-जॉर्ग उथर ने इसे बढ़ाया। इस इंडेक्स में शामिल कांगड़ा की लोककथा जनपद की गहरी लोककथा परंपरा की गवाही है।
ब्रिटिश लेखिका ‘फ्लोरा एनी स्टील की 1881 में प्रकाशित ‘इंडियन एंटीक्वारी’ में इस लोककथा का मूल स्वरूप में प्रकाशन हुआ। एनी स्टील ने पंजाब के लोक साहित्य पर काम किया था। तब कांगड़ा पंजाब की हिस्सा था, यही कारण है कि लोककथा की जड़ें हिमालयी लोकजीवन से जुड़ी हुई हैं। जोसफ जैकब ने 1892 में ‘इंडियन फेरी टेल्स’ में इस लोककथा को ‘द सन ऑफ सेवन मदर्स’ शीर्ष से प्रकाशित किया।
अन्याय के अंधेरे से न्याय की रोशनी तक
इस लोककथा में एक राजा, सात रानियां और एक छलिया राक्षसी रानी है, जो षड्यंत्र से सातों रानियों को अंधा करवाकर कारागार में डाल देती है। कारावास में जन्म लेता है एक बालक, जो सातों रानियों की ममता से पलता है।यही बालक आगे चलकर साहस, बुद्धि और करुणा के बल पर राक्षसी का अंत करता है, अपनी माताओं की आंखें लौटाता है और राज्य में न्याय बहाल करता है।
इस लोककथा में आंखें सत्य और विवेक, राक्षसी सत्ता का अंधा लोभ, सात माताएं सामूहिक करुणा और सहनशक्ति और नायक पुत्र नैतिक प्रतिरोध का प्रतीक है। भाषाएं बदलती हैं, पात्र बदलते हैं, पर अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की आत्मा वही रहती है। यही लोककथा की ताक़त है। यह केवल एक परीकथा नहीं, बल्कि स्त्री-एकजुटता, मातृत्व, और नैतिक साहस की हिमालयी घोषणा है।
कांगड़ा की सांस्कृतिक पहचान
आधी सदी से कांगड़ा लोक साहित्य परिषद के बैनर तले कांगड़ा के लोक साहित्य की मुकर आवाज, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ गौतम व्यथित कहते हैं कि कांगड़ा जनपद की लोककथा परंपरा लोकबुद्धि की विरासत है। कांगड़ा की लोककथाएं बताती हैं कि यहां की संस्कृति सिर्फ़ प्रकृति-पूजा नहीं, बल्कि नैतिक चेतना की भी उपासना है।
‘सात माताओं का बेटा’ लोककथा से यह सीख मिलती है कि अन्याय चाहे जितना गहरा हो, अंततः विजयी सत्य और धैर्य ही होते हैं। सत्ता के अंधेपन, झूठे आकर्षण से सावधान रहने की सीख और सामूहिक साहस की ताक़त की सीख देते हुए यह कथा आज के समाज को भी आईना दिखाती है। कांगड़ा की यह लोकगाथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी सदियों पहले थी।
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Jyoti maurya

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