लंदन के नेशनल आर्मी म्यूजियम में संरक्षित कांगड़ा का वीर हवलदार भगत राम का मैडल, दूसरे विश्वयुद्ध में चमार रेजिमेंट के वीर सपूतों की प्रेरक गाथा

लंदन के नेशनल आर्मी म्यूजियम में संरक्षित कांगड़ा का वीर हवलदार भगत राम का मैडल, दूसरे विश्वयुद्ध में चमार रेजिमेंट के वीर सपूतों की प्रेरक गाथा
लंदन के नेशनल आर्मी म्यूजियम में संरक्षित कांगड़ा का वीर हवलदार भगत राम का मैडल, दूसरे विश्वयुद्ध में चमार रेजिमेंट के वीर सपूतों की प्रेरक गाथा
शिव कुमार। कांगड़ा
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब ब्रिटिश सेना ने पहली बार तथाकथित ‘नॉन-मार्शल क्लास’ से रेजिमेंटें बनाई। इसी क्रम में 1 मार्च 1943 को चमार रेजिमेंट का गठन हुआ, जिसका मुख्यालय जबलपुर में स्थापित किया गया। इस रेजिमेंट की तैनाती बर्मा, नागालैंड और पूर्वोत्तर भारत में हुई। 1946 तक वजूद में रही यह चमार रेजिमेंट इतिहास का एक अनसुना, लेकिन अत्यंत प्रेरक अध्याय है।
कांगड़ा जिला के चिनीहार गांव के वीर हवलदार भगत राम इस गाथा का सबसे चमकता नाम है, जिन्हें 1945 में सेना मेडल से सम्मानित किया गया और उनकी वीरता का किस्सा 12 जुलाई 1945 लंदन गजट में प्रकाशित हुआ—जो किसी भारतीय सिपाही के लिए अत्यंत गौरव का क्षण था। आज भी उनका मेडल लंदन के नेशनल आर्मी न्यूजीयम में संरक्षित है।
पहली चमार रेजीमेंट को बैटल ओनर
1944–45 के बर्मा अभियान में चमार रेजिमेंट ने इंफाल की घेराबंदी तोड़ने में मदद की और जापानी सेना को पीछे धकेलते हुए पूरे बर्मा को मुक्त कराने में भूमिका निभाई। युद्ध के अंत तक इस रेजिमेंट के सैनिकों को दिलेरी नौर साहस के लिए 3 मिलिट्री क्रॉस, 3 मिलिट्री मैडल, 5 ब्रिटिश इम्पायर मेडल, 7 बर्मा स्टार, 4 पेसिफिक स्टार और 8 मेंशंड इन डिस्पेचेज़ मिले।
1944 में चमार रेजिमेंट की पहली बटालियन को नागालैंड भेजा गया, जब जापानी सेना भारत की पूर्वोत्तर सीमाओं तक पहुंच चुकी थी। कोहिमा युद्ध में इस रेजिमेंट ने अग्रिम मोर्चों पर लड़ते हुए रसद पहुंचाई और दुश्मन की छिपी टुकड़ियों को नेस्तनाबूद किया। इस युद्ध के लिए पहली चमार रेजीमेंट को बैटल ओनर प्रदान किया गया।
भुला दिया गया सुनहरा इतिहास
इसके बाद इम्फाल, बर्मा, रंगून और सिंगापुर तक यह रेजिमेंट जापानी सेनाओं के खिलाफ निर्णायक अभियानों में शामिल रही। युद्ध समाप्त होते ही 1946 में, व्यापक सैन्य विमोचन के तहत चमार रेजिमेंट को भंग कर दिया गया, लेकिन सवाल आज भी उठता है कि जब सिख, जाट, डोगरा और गोरखा रेजिमेंटें बनी रहीं, तो चमार रेजिमेंट क्यों नहीं?
इसी प्रश्न को लेकर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, कई सामाजिक और राजनीतिक नेताओं ने इसके पुनर्गठन की मांग उठाई है। कांगड़ा के हवलदार भगत राम जैसे योद्धा साबित करते हैं कि वीरता किसी जाति की बपौती नहीं होती। कांगड़ा के गांवों से निकले चमार रेजीमेंट के सैनिक ब्रिटिश सेना का हिस्सा होने के साथ आधुनिक भारत के आत्मसम्मान और बराबरी की लड़ाई के अग्रदूत भी थे।
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Jyoti maurya

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