जीवन के रंग : इंग्लैंड के निकोलस को दलाई लामा से मिली जीवन की दिशा और गहराई, मैकलोडगंज में लिखा ‘कामला’ उपन्यास

जीवन के रंग : इंग्लैंड के निकोलस को दलाई लामा से मिली जीवन की दिशा और गहराई, मैकलोडगंज में लिखा ‘कामला’ उपन्यास
जीवन के रंग : इंग्लैंड के निकोलस को दलाई लामा से मिली जीवन की दिशा और गहराई, मैकलोडगंज में लिखा ‘कामला’ उपन्यास
विनोद भावुक। धर्मशाला
1950 में इंग्लैंड में जन्मे निकोलस कूपर 1970 में वे उन चुनिंदा ब्रिटिश युवाओं में थे, जो ज़मीनी रास्ते से भारत पहुँचे थे। उन्होंने लगभग एक साल यात्रा की और मैकलोडगंज में तिब्बती शरणार्थियों के साथ रहे। वहीं उन्हें दलाई लामा से निजी मुलाक़ात का सौभाग्य मिला, उसी एक अनुभव ने उनके जीवन की दिशा और गहराई तय कर दी।
इंग्लैंड लौटकर निकोलस ने शिक्षक बनने की पढ़ाई की। इलस्ट्रेशन और ग्राफ़िक डिज़ाइन में काम किया। वे 1988 में कॉलेज लेक्चरर बने और 2006 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। तीस रुपये महीने पर लिया गया कमरा, थंका पेंटिंग और ध्यान, 55 साल बाद भी मैकलोडगंज उनके दिल के करीब है। उनका उपन्यास ‘कामला’ इसी ऐतिहासिक यात्रा पर आधारित है।
भूगोल नहीं, आत्मा का सफर
इसके बाद स्पेन के अंडालूसिया और पुर्तगाल में गाँवों के घरों का नवीनीकरण, जैतून के पेड़ों की देखभाल, यह सब निकोलस कूपर के जीवन का हिस्सा बना। आज वे केंट के समुद्री शहर रैम्सगेट में अपने साथी के साथ रहते हैं। तीन उपन्यास लिख चुके निकोलस लेखन के साथ-साथ अपने पहले प्रेम चित्रकला की ओर लौट रहे हैं।
निकोलस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर अपने जीवन की कहानी को शेयर करते हुये 55 साल पहले मैकलोडगंज के दिनों को अपने जीवन के सबसे खास दिन बताया है। निकोलस के लिए मैकलोडगंज तक का सफ़र एक ऐसा सफर साबित हुआ, जिसने सिर्फ़ भूगोल नहीं, आत्मा को भी पार लगा दिया।
युद्ध के बाद की दुनिया और निकोलस की जवानी
निकोलस कूपर इंग्लैंड ऐसे समय में बड़े हुए, जब युद्ध के बाद की दुनिया धूसर रंगों में लिपटी हुई थी। वे उन लोगों में से नहीं थे जो ज़िंदगी के रहस्यों पर चढ़ी साधारण परतों को स्वीकार कर लें। बचपन से ही उनके भीतर सवाल थे, जिज्ञासा थी और एक अलग रास्ते पर चलने की बेचैनी थी।
उत्तर लंदन के केंटन इलाके में बिताए शुरुआती सालों में उनमें एक साथ व्यवस्था और विद्रोह दोनों भाव पैदा किए। उन्होंने इंसानी जज़्बे को समझना शुरू किया। थेम्स वैली उनका अगला संसार बना। यहीं उन्होंने शीत युद्ध, ढलते साम्राज्य, हत्याओं की खबरें, सेक्स, ड्रग्स और रॉक एन रोल की गूंज महसूस की।
ज़िंदगी का सबसे निर्णायक पल
निकोलस को महज़ छह साल की उम्र में रेडियो पर एल्विस प्रेस्ली की आवाज़ भीतर कुछ जगा दिया। यह एक ऐसी चेतना थी, जिसने युद्ध के बाद के धुंधले संसार को चीर दिया। वे अनजाने में ही ‘रिवर ऑफ़ रॉक’ में बह निकले। बीस साल की उम्र में पैदल भारत की यात्रा ने उनके जीवन को मकसद दे दिया।
निकोलस ने मैकलोडगंज से इंगलैंड लौटकर समरसेट के क्वीन्स कॉलेज टॉन्टन, फिर गिल्डफोर्ड और ब्रिस्टल में आर्ट कॉलेज से पढ़ाई की, शिक्षक बने और लेखन के साथ चित्रकला में डूबे। निकोलस की कहानी सिखाती है कि जीवन के सबसे बड़े मोड़ कभी-कभी छोटी व साधारण दिखने वाली घटनाओं से शुरू होते हैं, बस उन्हें महसूस करने की संवेदना चाहिए।
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Jyoti maurya

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