हिमाचल प्रदेश में आज भी खूब सुने जाते हैं पाकिस्तानी गायिका मलिका पुखराज के गाये डोगरी गीत

हिमाचल प्रदेश में आज भी खूब सुने जाते हैं पाकिस्तानी गायिका मलिका पुखराज के गाये डोगरी गीत
हिमाचल प्रदेश में आज भी खूब सुने जाते हैं पाकिस्तानी गायिका मलिका पुखराज के गाये डोगरी गीत
ज्योति मोर्या। धर्मशाला
‘बेलुआ, बेलुआ बेलुआ हो’, ‘उडियां कूंजां जाईं पेईयां’,और ‘फंदू मज़ूरिया नइं हो लाणा’ जैसे डोगरी लोकगीत आज भी डुग्गर क्षेत्र यानी जम्मू और हिमाचल प्रदेश के कई हिस्सों में खूब सुने जाते हैं। इस गीतों में डोगरी भाषा की सहजता, लोक जीवन की पीड़ा और स्त्री मन की संवेदनशीलता एक साथ गूंजती है। यही कारण है कि ये गीत समय की सीमाओं से परे आज भी जीवंत हैं।
पर, क्या आपको यह पता है कि इन गीतों को अपनी मखमली आवाज में मलिका पुखराज ने गया है। जी हाँ, वही गजल गायिका जो विभाजन के बाद लाहौर चली गईं और ग़ज़ल और लोकगायन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा कर अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाई। बावजूद इसके उनकी गायकी में डोगरी आत्मा कभी विलुप्त नहीं हुई। उन्होंने डोगरी लोकगीतों को शास्त्रीय गरिमा प्रदान की।
नौ साल की उम्र, दरबारी गायिका नियुक्त
साल 1912 में अखनूर नदी के तट पर बसे मीरपुर गांव में जन्मी मलिका पुखराज का जीवन एक संगीत यात्रा है। बचपन में ही उनकी विलक्षण प्रतिभा पहचान ली गई थी। पांच वर्ष की आयु से ही उन्होंने नोहा और मर्सिया का पाठ शुरू कर दिया था। यह वही दौर था जब उनकी मधुर आवाज़ में डोगरी लोकभाव पहली बार आकार लेने लगी।
उनके जीवन में निर्णायक मोड़ आया जब उन्होंने महाराजा हरि सिंह के राज्याभिषेक समारोह में गायन किया। नौ साल की उम्र में वे जम्मू-कश्मीर रियासत की दरबारी गायिका नियुक्त हुईं। यह उस दौर में किसी बालिका के लिए असाधारण उपलब्धि थी। उनकी आवाज़ जम्मू की धरती और डोगरा विरासत की आत्मा थी। मलिका पुखराज डोगरी संस्कृति, लोकभावना और शास्त्रीय संगीत की त्रिवेणी थीं।
सरहदों के पार लोगों के दिलों में जीवित
साल 1988 में जब मलिका पुखराज अंतिम बार जम्मू आईं, तो पूरा शहर एक उत्सव में बदल गया। वे अपने पुराने घर भी गईं, वह घर, जहां से डोगरी संगीत की यह अनमोल यात्रा शुरू हुई थी। मलिका पुखराज एक सख़्त और समर्पित गुरु भी थीं। उनकी पुत्री पाकिस्तान की प्रसिद्ध गायिका ताहिरा सैयद ने अपनी मां से ही संगीत की कठोर तालीम लेकर उनके कई डोगरी गीतों को पुनः जीवंत किया है।
1977 में मलिका पुखराज को ऑल इंडिया रेडियो का ‘लीजेंड ऑफ वॉयस’ सम्मान और 1980 में पाकिस्तान का ‘प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस’ पुरस्कार मिला। 4 फरवरी 2004 को इस्लामाबाद में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी जम्मू की हवाओं और डोगरी लोकगीतों में गूंजती है। डोगरी अस्मिता की सांगीतिक पहचान सरहदों से ऊपर उठकर आज भी लोगों के दिलों में जीवित है।
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Jyoti maurya

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