भारतीय साधु के रूप में दुनिया को ईसा मसीह का संदेश देने वाले शिमला के संन्यासी साधु सुंदर सिंह

भारतीय साधु के रूप में दुनिया को ईसा मसीह का संदेश देने वाले शिमला के संन्यासी साधु सुंदर सिंह
भारतीय साधु के रूप में दुनिया को ईसा मसीह का संदेश देने वाले शिमला के संन्यासी साधु सुंदर सिंह
विनोद भावुक। शिमला
शिमला की धरती से निकले हिमालय के संन्यासी साधु सुंदर सिंह ने ठान लिया कि वे भारतीय साधु के रूप में ईसा मसीह का संदेश देंगे। उन पर लोगों ने पत्थर मारे बरसाए, उन्हें जेल में डाला गया और कुओं में फेंक दिया गया, लेकिन वे फिर भी वे रुके नहीं। केसरिया चोगा पहने नंगे पांव, हाथ में लाठी और दिल में करुणा लिए दुनिया को यीशु का संदेश देते रहे।
वे पश्चिमी पादरी नहीं बने, बल्कि वे भारतीय साधु के रूप में ईसा मसीह का संदेश देने 1920–22 के बीच जब साधु सुंदर सिंह यूरोप और अमेरिका पहुंचे तो इतनी ख्याति हासिल कर चुके थे कि वहां के लोग कहते थे कि वे बिल्कुल यीशु जैसे दिखते हैं और शायद यीशु भी ऐसे ही बोलते होंगे। हालांकि वे पश्चिम की भौतिकता से निराश हुए और ध्यान और लेखन के लिए शिमला लौट आए।
शिमला के चर्च में हुआ बपतिस्मा
3 सितंबर 1889 को पंजाब के लुधियाना में सिख परिवार में जन्मे सुंदर सिंह का जीवन किशोरावस्था में गहरे द्वंद से गुज़रा। ईश्वर की खोज और प्रश्नों और पीड़ा के बीच 16 साल की उम्र में शिमला के चर्च में उनका बपतिस्मा हुआ। यही वह क्षण था, जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। यह धर्मांतरण नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और ईसाई विश्वास का एक अनोखा संगम था।
बपतिस्मा से पहले और बाद में साधु सुंदर सिंह सबाथू स्थित क्रिश्चियन मिशन में रहे, जहां उन्होंने कोढ़ियों की सेवा की। यहीं से उन्होंने तय किया कि वे ईसाई भेष भूषा की जगह केसरिया चोगा, नंगे पहन कर यशु की शिक्षा देंगे। तमाम अड़चनों के बावजूद हठयोगी साधु सुंदर सिंह अपने इरादे पर अटल रहे और नया इतिहास रच दिया।
तिब्बत की चुनौती, यूरोप में दिवानगी
शिमला की पहाड़ियों से निकलकर साधु सुंदर सिंह ने दुर्गम किन्नौर, लाहौल-स्पीति और तिब्बत तक की कठिन यात्राएं कीं। लोग उन्हें खून से सने पांवों वाला प्रेत करते थे और कभी उन्हें पत्थर मारते तो कभी कुएं में फेंक देते। यहाँ तक कि उन्हें जेल में डाला गया, लेकिन उनके मजबूत इरादे को तोड़ नहीं पाये।
वे रुके नहीं और अपनी धुन में यात्राएं करते रहे।
1920–22 के बीच वे यूरोप, ब्रिटेन और अमेरिका के प्रवास पर थे। एक ईसाई का भारतीय साधु वाला लिबास चर्चा में था, इसके बावजूद लोग उन्हें देखने और सुनने को बेताव थे। पश्चिम की भौतिकता उन्हें रास नहीं आई और वे शिमला लौट आए, लेकिन इस सद्गुरु की जिद ने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को चौंका दिया।
अंतिम यात्रा पर लापता होने रहस्य
1929 में साधु सुंदर सिंह ने कालका से तिब्बत की अंतिम यात्रा शुरू की। उसके बाद वे कभी नहीं दिखे।
क्या वे हिमालय में समाधि में लीन हो गए या किसी अज्ञात घाटी में उनका अंत हो गया। उनकी मौत का यह यह रहस्य आज भी शिमला की हवाओं में तैरता है। ईसाई धर्म प्रचारक यह भारतीय साधु को धरती खा गई या आसमान निगल गया, किसी को कुछ पता नहीं।
बेशक साधु सुंदर सिंह की मौत आज भी एक रहस्य बनी हुई है, पर शिमला की यह आध्यात्मिक विरासत आज भी दुनिया भर में संरक्षित है। चर्च ऑफ़ इंग्लैंड में हर साल 19 जून को साधु सुंदर सिंह को याद किया जाता है। साधू के भेष में रहने वाले एक भारतीय ईसाई की यादगार के तौर पर चर्च का निर्माण हुआ है।
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Jyoti maurya

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