लाहौल के युवा चित्रकार प्रताप सिंह पर शहीद भगत सिंह की खास मेहरबानी, बर्फीली वादियों से उभरती स्केचिंग, शेडिंग और फिगर ड्राइंग की कहानी
लाहौल के युवा चित्रकार प्रताप सिंह पर शहीद भगत सिंह की खास मेहरबानी, बर्फीली वादियों से उभरती स्केचिंग, शेडिंग और फिगर ड्राइंग की कहानी
विनोद भावुक। केलंग
लाहौल-स्पीति की ठंडी वादियों में जहां जीवन चुनौतियों के साथ आगे बढ़ता है, उसी धरती से एक युवक चित्रकार अपने रंगों, रेखाओं और कल्पना से कला की दुनिया में नई पहचान बना रहा है। लाहौल घाटी के गोंधला डाकघर के तहत आते शूलिंग गांव के 27 साल के प्रताप सिंह उभरते हुए चित्रकार हैं।
वे पोर्ट्रेट बनाने में खास महारत रखते हैं। अगर शहीद भगत सिंह का पोट्रेट न बनाया होता तो शायद उनका शौक जुनून तक नहीं पहुंचता। भगत सिंह का पोट्रेट बनाना स्केचिंग, शेडिंग और फिगर ड्राइंग के उनके सफर का टर्निंग पॉइंट बन गया। अब वे ऑर्डर पर पोर्ट्रेट बनाते हैं और साइन बोर्ड आर्ट करते हैं तथा वॉल पेंटिंग व म्यूरल आर्ट में हाथ आजमा रहे हैं।

रफ कॉपी से शुरू रंगों का सफर
प्रताप सिंह ने शिक्षा और कला दोनों को साथ लेकर चलने का साहसिक प्रयास किया। बाहरवीं के बाद आईटीआई उदयपुर से इलेक्ट्रिशियन ट्रेड में दो वर्षीय डिप्लोमा इग्नू, कुल्लू से स्नातक (आर्ट्स)
और फिर साल 2018-2020 के दौरान आरटीटीआई शाढाबाई से जेबीटी की। पढ़ाई के साथ-साथ उनके भीतर एक चित्रकला की एक और दुनिया आकार ले रही थी।
स्कूल के दिनों में प्रताप सिंह अक्सर अपनी रफ कॉपी में रेखांकन (स्केचिंग), छाया-प्रकाश (शेडिंग), और आकृति निर्माण (फिगर ड्राइंग) करते रहते थे। उस समय यह केवल शौक था, लेकिन जेबीटी प्रशिक्षण के दौरान मिला एक प्रोजेक्ट उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया और रंगों की दुनिया प्रताप सिंह को अपनी सी लगने लगी।

भगत सिंह ने बदली जिंदगी, पोर्ट्रेट की सेंचूरी
जेबीटी प्रशिक्षण के दौरान प्रताप सिंह को शहीद भगत सिंह का चित्र (पोट्रेट) बनाने का कार्य मिला। जब उन्होंने यह चित्र बनाया, तो अध्यापक ने उनकी रेखा संतुलन, भावाभिव्यक्ति (एक्स्प्रेसन) और आकृति की सटीकता की खूब सराहना की। उन्हें एहसास हुआ कि चित्रकला केवल शौक नहीं, बल्कि उनका जीवन उद्देश्य बन सकती है। बाद में प्रताप सिंह ने सबसे पहले अपने माता-पिता के पोर्ट्रेट बनाए।
यहीं से उनकी कला में यथार्थवाद (रियलिस्टिक आर्ट), चेहरे की भावनात्मक अभिव्यक्ति, सूक्ष्म रेखांकन
जैसी तकनीकों का विकास हुआ। आज प्रताप सिंह 100 से अधिक पोर्ट्रेट बना चुके हैं। अब वे ऑर्डर पर चित्र बनाते हैं, बोर्ड राइटिंग (साइन बोर्ड आर्ट) करते हैं तथा वॉल पेंटिंग और म्यूरल आर्ट सीख रहे हैं। उनकी कला में रंग संयोजन, संतुलन, दृश्य संरचना, और लोक संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।

लाहौल की कला—प्रतिभा है, पहचान कम
प्रताप सिंह मानते हैं कि लाहौल-स्पीति में कई प्रतिभाशाली कलाकार मौजूद हैं, लेकिन यहां कला को वह मंच और सम्मान नहीं मिल पाता, जिसकी वह हकदार है। उनका सपना है कि कलाकारों को आगे आने का मौका मिले, कला रोजगार का मजबूत माध्यम बने और समाज और प्रशासन कला को गंभीरता से अपनाए।
प्रताप सिंह की कहानी का संदेश साफ है कि कला किसी बड़े शहर की मोहताज नहीं होती। जुनून, अभ्यास और लगन हो, तो बर्फीली घाटियों में भी रंगों के सपने आकार ले सकते हैं। अगर आप भी अपना या किसी अपने का पोर्ट्रेट बनवाना चाहते हो तो कमेन्ट में अपना ऑर्डर दे सकते हैं। प्रताप सिंह की कला दूर तक पहुंचे, इसलिए पोस्ट जम कर शेयर करें।

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