आयरलैंड से साइकिल पर डर्वला मर्फ़ी भारत आई, मलाणा में पहुंच कर क्रिसमिस मनाई, मैकलोडगंज में तिब्बती शरणार्थी कैंप में गुजारे पांच माह, दुनिया भर की यात्राएं, 25 पुस्तकों का लेखन
आयरलैंड से साइकिल पर डर्वला मर्फ़ी भारत आई, मलाणा में पहुंच कर क्रिसमिस मनाई, मैकलोडगंज में तिब्बती शरणार्थी कैंप में गुजारे पांच माह, दुनिया भर की यात्राएं, 25 पुस्तकों का लेखन
विनोद भावुक। धर्मशाला
यहां से डर्वला ने कुल्लू की राह पकड़ी। क्रिसमिस के मौके पर वे दुनिया से सबसे पुराने लोकतंत्र मलाणा गांव में थी। हिमालय में बिताए दिनों के अनुभव उनकी दूसरी किताब, ‘तिब्बतेन फुटहोल्ड’ में प्रकाशित हुये, जिसमें उन्होंने कांगड़ा की पहाड़ियों और कुल्लू की घाटियों की अलग-अलग सांस्कृतिक छवियों को अपने लेखन में जीवंत किया।
पेनलोप चेटवुड से मुलाक़ात, लिखने की सीख
1963 में 32 साल की उम्र में डर्वला ने साइकल पर आयरलैंड से भारत तक की अपने जीवन की पहली लंबी यात्रा की शुरुआत की। इस यात्रा के दौरान वह एक पिस्टल भी अपने साथ रखे थी। यूरोप में उसे भीषण सर्दी का सामना करना पड़ा। ईरान में चोरों से मुक़ाबले के लिए फायर करना पड़ा। अफगानिस्तान में बस हादसे में गंभीर रूप से घायल हुई।
यह यात्रा साहस और आत्मनिर्भरता की परीक्षा थी। पाकिस्तान होते हुये वे दिल्ली पहुंची, जहां शिमला से खच्चर पर कुल्लू की यात्रा करने वाली उस दौर की मशहूर ब्रिटिश लेखिका पेनलोप चेटवुड से मुलाक़ात हुई। उनके सुझाव पर डर्व्ला ने 1963 में अपनी पहली किताब ‘फुल टिल्ट : आयरलैंड टू इंडिया विद बायसाइकिल’ प्रकाशित की।
चुनौतियों का मजबूती से मुक़ाबला
डर्वला बिना किसी विलासिता के केवल स्थानीय लोगों की मेहमाननवाजी पर भरोसा करते हुए अकेले यात्रा करती थीं। यूरोप, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान की कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने साहस और धैर्य का परिचय दिया। अफ़ग़ानिस्तान में उन्हें गोली लगने जैसी चोटें भी आईं, लेकिन यह उनके रुकने का कारण नहीं बनी।
भारत की यात्रा के बाद उन्होंने नेपाल के पोखरा की यात्रा कर तिब्बती शरणार्थियों की मदद की। साल 1966 में उन्होंने एथियोपिया में यात्रा की, जहां उन्होंने खच्चर के साथ लंबी दूरी तय की और सशस्त्र सैनिकों का सामना किया। साहस, स्वतंत्रता और जीवन के प्रति उत्सुकता ने हमेशा उन्हें प्रेरित किया और सामाजिक अन्याय के खिलाफ मुखर आवाज दी।
राजनीति और सामाजिक चेतना
डर्वला ने अपने जीवन में अपनी बेटी राचेल को कई यात्राओं पर साथ लिया। भारत, पाकिस्तान, बाल्टिस्तान, पेरू और मैडागास्कर की यात्राओं में दोनों ने एक-दूसरे के साहस और जिज्ञासा साझा किया। अकेली महिला का इतनी दूर यात्रा करना उस समय असामान्य बात थी, जिस कारण कैमेरून की यात्रा में उन्हें अक्सर उनकी बेटी का पति समझा जाता था।
डर्वला ने उत्तर आयरलैंड, ब्रैडफोर्ड, ज़िम्बाब्वे, दक्षिण अफ्रीका, रवांडा, और लाओस में सामाजिक, राजनीतिक और मानवाधिकार संबंधी मुद्दों को भी नज़दीक से देखा और उस पर जमकर लिखा।
उन्होंने 25 किताबें लिखीं, जिनमें ‘ए प्लेस अपार्ट’, ‘द उकिंवी रोड’, ‘विजिटिंग’ जैसी पुस्तकें यात्रा और समाज की समझ का अद्भुत मिश्रण हैं।
गिफ्ट में साइकिल, दुनिया घूमने का सपना
2005 में उन्होंने अपनी बेटी और तीन दोहतियों के साथ क्यूबा की यात्रा की और 2011 में गाज़ा पट्टी में एक महीना गुजारा। 22 मई 2022 को 90 वर्ष की आयु में डर्वला मर्फ़ी का निधन हुआ। उनके निधन पर आयरलैंड के तत्कालीन राष्ट्रपति माइकल डी. हिगिन्स ने उन्हें मानव अनुभव की विविधता के प्रति प्रतिबद्धता के लिए अद्वितीय योगदान कहा।
28 नवंबर 1931 को आयरलैंड के काउंटी वॉटरफोर्ड में जन्मी डर्वला ने अपने दसवें जन्मदिन पर एक साइकिल और एक अटलस की गिफ्ट पाकर जीवन में साइकिल पर दुनिया घूमने का सपना देखा था, जिसमें ताउम्र रंग भरे। हिमालय की पहाड़ियों से लेकर अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की दूरदराज़ भूमि तक उनकी यात्राएं अद्भुत साहस और जिजीविषा का प्रतीक है।
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