100 साल पहले साइकिल पर सवार होकर सिख गुरुओं से जुड़े कांगड़ा, कुल्लू और बिलासपुर को कैमरे में कैद कर गए भाई धन्ना सिंह ‘पटियालवी’

100 साल पहले साइकिल पर सवार होकर सिख गुरुओं से जुड़े कांगड़ा, कुल्लू और बिलासपुर को कैमरे में कैद कर गए भाई धन्ना सिंह ‘पटियालवी’
100 साल पहले साइकिल पर सवार होकर सिख गुरुओं से जुड़े कांगड़ा, कुल्लू और बिलासपुर को कैमरे में कैद कर गए भाई धन्ना सिंह ‘पटियालवी’
विनोद भावुक। धर्मशाला
आज से लगभग 100 साल पहले जब भारत पर अंग्रेजों का राज था, पंजाब के संगरूर के एक अद्भुत व्यक्ति लाल सिंह चहल साइकिल पर सवार होकर सिख इतिहास व देश भर में सिख गुरुओं से जुड़े स्थलों का दस्तावेजीकरण कर उसे सिख अखबारों में सचित्र प्रकाशित भी करवा रहे थे। वे भाई धन्ना सिंह ‘पटियालवी’ के नाम से पहचाने जाते थे। उन्होंने साइकिल पर 25,000 मील नाप दिये।
लाल सिंह चहल ने आध्यात्मिक और सिख पवित्र यात्रा के बाद धन्ना सिंह नाम अपनाया था और खुद को ‘साइकिल यात्रु’ कहते थे। उन्होंने 1933 में नादौन के दसवीं पत्शाही गुरुद्वारा को अपने कैमरे में कैद किया और उसी साल जून में कुल्लू के मनिकर्ण स्थित पवित्र सिख स्थल और गर्म पानी के चश्मों की तस्वीरें खींची। 1934 में उन्होंने बिलासपुर के प्रसिद्ध शक्तिपीठ नैना देवी मंदिर के फोटो क्लिक किए।
पटियाला का यतिमखाना, रॉयल्टी से रोजगार
धन्ना सिंह का जन्म लगभग 1893 में पंजाब के संगरूर जिला के घन्नौरी गांव में हुआ। जब वे केवल दस साल के थे, उनके पिता का निधन हो गया। पिता की मौत के बाद बच्चों के लिए बुरे दिन शुरू हो गए। उन्हें और उनके भाई को राजेंद्र-देव यतिमखाना, पटियाला भेज दिया गया। यतिमखाना ही वह पहली जगह थी, जहां पर उन्हें धार्मिक शिक्षा मिली।
युवावस्था में धन्ना सिंह ने महाराजा भूपिंदर सिंह के रॉयल गैराज में काम किया। वे वहां वाहन चालक थे, लेकिन नांदेड़ की यात्रा के दौरान संत निदान सिंह से प्रभावित होकर उन्होंने पाहुल संस्कार ग्रहण किया और खालसा नाम अपनाया। इसके बाद उन्होंने महाराजा की नौकरी छोड़ दी और अपनी साइकिल और कैमरे के साथ सिख इतिहास का दस्तावेजीकरण करने देश यात्रा पर निकल पड़े।
साइकिल पर 25,000 मील का सफर
धन्ना सिंह ने 1920 के दशक में पंजाब सहित उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और असम की यात्रा की और सिख इतिहास और गुरुओं से जुड़े स्थलों का दस्तावेजीकरण किया। इन यात्राओं को उन्होंने सिख अखबारों में प्रकाशित कराया। तीन साल बाद, उन्होंने फोटोग्राफी सीखी और साइकिल के साथ देशभर के सिख तीर्थस्थलों की तस्वीरें लेना शुरू किया। उनकी यात्रा कुल लगभग 25,000 मील की थी।
धन्ना सिंह ने सिख गुरुद्वारों, मंदिरों, किलों और तीर्थस्थलों की 200 से अधिक अनमोल तस्वीरें लीं और प्रत्येक फोटो के पीछे विस्तृत जानकारी लिखी। बाद में इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए यह अमूल्य दस्तावेज बन गया। नैना देवी मंदिर, जम्रूद किला, नादौन का गुरुद्वारा, कीरा साहिब गुरुद्वारा कुल्लू का माणिकरण गुरुद्वारा, गुरु नानक का चक्की एमीनेबाद उनकी कुछ प्रमुख तस्वीरें हैं।
उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत पर तोड़ा दम
जिस स्थानों को उन्होंने अपने ब्लैक एंड व्हाइट कैमरे में सदा के लिए कैद कर लिया था, आज उनमें से कई स्थान नवीनीकरण या ध्वंस के कारण बदल चुके हैं, लेकिन धन्ना सिंह की तस्वीरें 1930 के दशक के असली पंजाब और सिख संस्कृति को दर्शाती हैं। पंजाब के अखबारों में इस धरोहर संरक्षक का थोड़ा- बहुत जिक्र हुआ है, लेकिन हिमाचल के मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए वे अछूत ही रहे हैं।
2 मार्च 1935 को भारत की उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (अब पाकिस्तान) के हासोखेळ गांव के पास दुर्घटनावश हथियार चल जाने से धन्ना सिंह का निधन हो गया। उनके संग्रह को पहले मिस्त्री गुरबक्श सिंह और फिर उनके परिवार ने सुरक्षित रखा। अब यह संग्रह पंजाब डिजिटल लाइब्रेरी में संरक्षित है। में इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए यह अनमोल खजाना है।
आठ डायरी और लगभग 200 तस्वीरें
धन्ना सिंह ने सिख तीर्थस्थलों और पंजाब के इतिहास को अपने साइकिल और कैमरे के माध्यम से अमर कर दिया। उनके आठ डायरी और लगभग 200 तस्वीरें शोधकर्ताओं और इतिहास प्रेमियों के लिए आज भी मूल्यवान हैं। एक धरोहर संरक्षक के काम को याद करने के लिए 2011 में उनके 15 तस्वीरों का वेबिनार ‘डे – फ्रीजिंग 1930’ पंजाब’ में प्रदर्शित किया गया।
भाई धन्ना सिंह का जीवन प्रेरणा देता है कि समर्पण, साधना और कला के माध्यम से इतिहास को सुरक्षित और संरक्षित किया जा सकता है। सच्चे जुनून के लिए जीवन की सीमाएं कोई बाधा नहीं बन सकतीं। सोशल मीडिया के दौर में कंटेन्ट क्रिएशन रोजगार हो गया है, तो हर क्रिएटर को भाई धन्ना सिंह से सीखना चाहिए कि कैमरे का एंगल क्या होता है और तस्वीर का कंटेन्ट कैसे लिखा जाता है।
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Jyoti maurya

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