नदी पर कब्जे को लेकर भारत सरकार में पर्यावरण मंत्री पर चढ़ाई, सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरण कानून का मीलपत्थर बन गई लड़ाई
नदी पर कब्जे को लेकर भारत सरकार में पर्यावरण मंत्री पर चढ़ाई, सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरण कानून का मीलपत्थर बन गई लड़ाई
समीर कश्यप। कुल्लू
रोहतांग के ब्यास कुंड से निकाल कर हिमाचल प्रदेश से बहने वाली ब्यास नदी केवल जलधारा नहीं जीवनरेखा है। जब इसी नदी के किनारे प्रकृति से छेड़छाड़ हुई, जंगल काटे गए और नदी की धारा मोड़ी गई, तब एक व्यक्ति ने आवाज़ उठाई। यह आवाज़ थी पर्यावरण योद्धा एम.सी. मेहता की और यह लड़ाई भारत के पर्यावरण कानून का मील का पत्थर बन गई।
साल 1990–94 के बीच कुल्लू जिले में ब्यास नदी के किनारे स्थित स्पेन मोटेल प्राइवेट लिमिटेड स्पेन रिसौर्ट और क्लब बनाने के लिए 27 बीघा 12 बिस्वा वन भूमि पर कब्ज़ा कर लिया, जिसमें ब्यास नदी का किनारा और नदी-तल भी शामिल था। इस ज़मीन को उस समय नियमित किया गया, जब कमल नाथ भारत सरकार में पर्यावरण एवं वन मंत्री थे।
नदियां, जंगल, हवा, समुद्र और वन सरकार की निजी संपत्ति नहीं
इसका परिणाम यह हुआ कि ब्यास नदी की धारा बदली, बाढ़ आई, भूस्खलन का ख़तरा बढ़ा और 105 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति नष्ट हो गई। एम.सी. मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाख़िल कर सवाल उठाया कि क्या सरकार को यह अधिकार है कि वह नदियों, जंगलों और पहाड़ों को निजी व्यापार के लिए सौंप दे?
सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की अगुवाई वाली पीठ ने एक ऐतिहासिक सिद्धांत ‘लोक न्यास सिद्धांत’ को भारतीय कानून का हिस्सा घोषित किया। इसका अर्थ है नदियां, जंगल, हवा, समुद्र और वन सरकार की निजी संपत्ति नहीं हैं। सरकार इनकी ट्रस्टी है। इन्हें निजी लाभ या व्यवसाय के लिए नहीं दिया जा सकता है।
पर्यावरण बनाम सत्ता के संघर्ष में जनहित की जीत
कोर्ट ने साफ़ कहा कि हिमाचल प्रदेश सरकार ने लोक न्यास का गंभीर उल्लंघन किया है। ब्यास नदी के किनारे दी गई लीज़ अवैध है, 1994 की लीज़ रद्द की जाती है। पूरी ज़मीन सरकार वापस लेगी, क्षेत्र को प्राकृतिक अवस्था में बहाल किया जाएगा और मोटेल प्रबंधन को पर्यावरण क्षति की भरपाई करनी होगी।
प्रकृति की सुंदरता और पारिस्थितिकी को निजी मुनाफ़े के लिए नष्ट नहीं किया जा सकता।
ब्यास नदी एक युवा और तीव्र बहने वाली नदी है, जो बाढ़ के समय बड़े-बड़े पत्थर बहाकर लाती है। इसका रास्ता बदलना पूरी घाटी के लिए ख़तरनाक है। कोर्ट ने माना कि इस क्षेत्र को कभी भी निजी स्वामित्व में नहीं दिया जाना चाहिए था। देश की शीर्ष अदालत में यह पर्यावरण बनाम सत्ता के संघर्ष में जनहित की जीत थी।
(लेखक मंडी जिला एवं सत्र न्यायलय में अधिवक्ता हैं)
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