बीएचयू के लिए लाखों का चन्दा जुटाने वाले और यूरोप में गांधी के दूत बने सुंदरम कभी मदन मोहन मालवीय के मिशन के लिए अंग्रेज़ी पढ़ने आए थे कोटगढ़
बीएचयू के लिए लाखों का चन्दा जुटाने वाले और यूरोप में गांधी के दूत बने सुंदरम कभी मदन मोहन मालवीय के मिशन के लिए अंग्रेज़ी पढ़ने आए थे कोटगढ़
विनोद भावुक। शिमला
शिमला का कोटगढ़ आज भले ही ‘सेब की घाटी’ के नाम से जाना जाता हो, लेकिन बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में यह स्थान स्वतंत्रता, शिक्षा और नैतिक चेतना का भी एक बड़ा केंद्र था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक संवेदनशील, विद्वान और कर्मठ सिपाही वी. ए. सुंदरम इसी कोटगढ़ में शिक्षा की अलख जगाने पहुंचे थे।
साल 1926 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय ने अपने विश्वासपात्र सहयोगी वी. ए. सुंदरम को विशेष जिम्मेदारी देकर हिमालयी क्षेत्र कोटगढ़ भेजा, जहां अमेरिकी मूल के गांधीवादी सैमुअल एवन्स स्टोक्स ने एक स्कूल स्थापित किया था और उन्हें एक योग्य अंग्रेज़ी शिक्षक की आवश्यकता थी।
सेब से पहले चरित्र की खेती
सुंदरम अपनी नवविवाहित पत्नी सावित्री के साथ कोटगढ़ पहुँचे। यह केवल एक शिक्षकीय नियुक्ति नहीं थी, यह गांधीवादी प्रयोगशाला में प्रवेश था। कोटगढ़ में 1920 के दशक में यहाँ स्वदेशी शिक्षा, नैतिक अनुशासन और गांधीवादी जीवन-पद्धति को बोया जा रहा था। सुंदरम ने कोटगढ़ में थोड़ा समय बिताया, गहरा प्रभाव छोड़ा। वे हर सप्ताह गांधी को पत्र लिख उच्च और उदात्त विचार साझा करते थे।
गांधी इन पत्रों को सहेजकर रखते थे। वर्षों बाद गांधी ने एक कपड़े की थैली से पत्र निकालकर सुंदरम को लौटाते हुए कहा था कि मैंने इन्हें खोया नहीं। पेंगुइन से प्रकाशित अपनी पुस्तक, ‘एन अमेरिकन इन गांधीज़ इंडिया- बायोग्राफी ऑफ सत्यानन्द स्टॉक्स’ में आशा शर्मा लिखती हैं कि यह प्रसंग कोटगढ़ को गांधी के नैतिक संसार से जोड़ देता है।
हिमालय, गांधी और संवाद
कोटगढ़ में रहते हुए सुंदरम का गांधी से निरंतर संवाद बना रहा। यह वही दौर था जब गांधी चरखा, ग्राम-स्वराज और नैतिक राजनीति के प्रयोगों को देशभर में फैलाने की तैयारी कर रहे थे। कोटगढ़ जैसे दूरस्थ स्थान इन विचारों के जीवंत केंद्र बन रहे थे। यहीं सुंदरम ने यह सीखा कि शिक्षा केवल किताबों से नहीं, जीवन से आती है।
इतिहास में कोटगढ़ को अक्सर केवल सेब क्रांति से जोड़ा जाता है, लेकिन सच यह है कि यहीं गांधीवादी शिक्षा ने जड़ें पकड़ीं। यहीं से बीएचयू और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए वैचारिक ऊर्जा पहुँची। यहीं से सुंदरम जैसे कार्यकर्ता राष्ट्र-निर्माण के लिए तैयार हुए और शिमला का वह छोटा सा इलाका भारत के बौद्धिक और नैतिक इतिहास में चुपचाप बड़ा योगदान दे गया।
सुंदरम के जीवन में कोटगढ़ का अर्थ
कोटगढ़ सुंदरम के लिए एक तपस्थली, गांधी से आत्मिक संवाद का स्थान और जीवनभर साथ रहने वाला अनुभव था। बाद में जब सुंदरम बीएचयू के लिए लाखों रुपये जुटाने वाले महान संग्राहक बने, यूरोप में गांधी के दूत बने और अपने घर कृष्ण कुटीर में गांधी की मेज़बानी की, उस हर भूमिका की जड़ें कहीं न कहीं कोटगढ़ में थीं।
कोटगढ़ केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, यह विचारों की नर्सरी था। यहाँ से निकले बीजों ने
भारत की शिक्षा, स्वतंत्रता और नैतिक राजनीति को सींचा। और वी. ए. सुंदरम जैसे कर्मयोगी इस बात के प्रमाण हैं कि अगर विचार बड़े हों तो छोटे स्थान भी इतिहास रचते हैं।
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