अंग्रेज़ी सत्ता को खुली चुनौती देने वाले गुरु नानक के वंशज ऊना के बाग़ी संत बिक्रम सिंह बेदी, अंग्रेज़ो ने जब्त कर लिया था जिनका पालतू गैंडा
अंग्रेज़ी सत्ता को खुली चुनौती देने वाले गुरु नानक के वंशज ऊना के बाग़ी संत बिक्रम सिंह बेदी, अंग्रेज़ो ने जब्त कर लिया था जिनका पालतू गैंडा
विनोद भावुक। ऊना
हिमाचल प्रदेश सीमांत ऊना क्षेत्र केवल पहाड़ों और सीमांत भूगोल की पहचान भर नहीं है। यह सिख इतिहास के उन अध्यायों का भी साक्षी रहा है, जहां आध्यात्म और प्रतिरोध एक साथ खड़े दिखाई देते हैं।
गुरु नानक देव जी के प्रत्यक्ष वंशज बिक्रम सिंह बेदी जिन्होंने अंग्रेज़ी औपनिवेशिक सत्ता के सामने झुकने से इनकार कर दिया, इसी धरती से जुड़ा एक नाम है।
बिक्रम सिंह बेदी, साहिब सिंह बेदी के पुत्र थे। साहिब सिंह बेदी वही सम्मानित सिख व्यक्तित्व थे, जिन्होंने महाराजा रणजीत सिंह के शासन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1834 में पिता के निधन के बाद बिक्रम सिंह ने ऊना स्थित पारिवारिक जागीर की कमान संभाली, जबकि उनके भाई बिशन सिंह को रावलपिंडी के क़ल्लर की संपत्ति मिली।
बाबा दरबारा सिंह से प्रभावित, जत्था परंपरा से दीक्षित
ऊना उस दौर में कांगड़ा और जालंधर दोआब के बीच राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से बेहद संवेदनशील इलाका था। बिक्रम सिंह बेदी केवल राजसी या धार्मिक व्यक्ति नहीं थे। उनका व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा था। वे निरंकारी उपदेशक बाबा दरबारा सिंह से प्रभावित थे, बीर सिंह नौरणगाबाद की जत्था परंपरा से दीक्षित हुए और खुद को जन्मसिद्ध रूप से सत्ता और नियमों से ऊपर मानते थे।
उनके जीवन में कुछ हिंसक और विवादास्पद घटनाएँ भी दर्ज हैं, जिन्होंने सिख दरबार और समाज दोनों को झकझोरा। केंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित पुस्तक, ‘द सिख ऑफ पंजाब’ में जे एस ग्रेवाल लिखते हैं कि पहले एंग्लो–सिख युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने बिक्रम सिंह से हथियार छीन लिए, ऊना स्थित उनका किला ध्वस्त कर दिया और संपत्ति पर कड़ी निगरानी लगा दी।
अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह, अमृतसर में नज़रबंद
अंग्रेजों की ज्यादती से तंग आकार ऊना का यह बेदी वंशज खुले विद्रोह की ओर बढ़ा। 1848–49 के दौर में जब दूसरे एंग्लो–सिख युद्ध की आग भड़क रही थी, बिक्रम सिंह बेदी ने दीवान मूलराज से संपर्क किया
और कांगड़ा और जालंधर क्षेत्रों में सिख विद्रोह को संगठित करने में भूमिका निभाई। इतिहासकारों के अनुसार, ऊना उनका रणनीतिक केंद्र था, जहाँ से पहाड़ी इलाकों में समर्थन पहुँचाया गया।
सिख साम्राज्य के पतन के बाद अंग्रेज़ों ने उनकी सारी संपत्ति ज़ब्त कर ली। उन्हें अमृतसर में नज़रबंद रखा गया। उन्हें जीवन के अंतिम वर्ष बुरे दौर की तरह थे। बुढ़ापे के दिन उन्हें एक मामूली ब्रिटिश पेंशन पर बिताने पड़े। यह उस व्यक्ति का अंत था, जिसने स्वयं को गुरु नानक की परंपरा का राजनैतिक संरक्षक माना था।
अंग्रेज़ो ने जब्त कर लिया पालतू गैंडा
1857 के विद्रोह के दौरान जब बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की 59वीं रेजीमेंट ऊना पहुँची, तो बिक्रम सिंह की जागीर से उनका पालतू गैंडा तक जब्त कर लिया गय। अंग्रेज़ी सत्ता की इस यह घटना को मानसिक और प्रतीकात्मक दमन का उदाहरण माना गया। ऊना की धरती पर जन्मे इस विद्रोही संत की 1862 में मृत्यु हो गई।
अमृतसर में स्थित गुरुद्वारा बाबा बिक्रम सिंह बेदी आज भी उनके नाम की गवाही देता है। विरसती आस्थान सेवा संस्था इस स्थल का संरक्षण कर रही है। बिक्रम सिंह बेदी केवल एक ऐतिहासिक पात्र नहीं, बल्कि प्रतिरोध, परंपरा और टकराव का प्रतीक हैं। बिक्रम सिंह बेदी की कहानी यह बताती है कि ऊना जैसे क्षेत्र औपनिवेशिक भारत के प्रतिरोध में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।
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