बिरह के सम्राट के संग पंजाब की आत्मा के चित्रकार, शिव बटालवी की 1972 की इंग्लैंड यात्रा में चित्रकार सरदार शोभा सिंह मौजूदगी
बिरह के सम्राट के संग पंजाब की आत्मा के चित्रकार, शिव बटालवी की 1972 की इंग्लैंड यात्रा में चित्रकार सरदार शोभा सिंह मौजूदगी
विनोद भावुक। पालमपुर
मई 1972 में पंजाबी साहित्य के इतिहास में एक ऐसा समय, जब शायर शिव कुमार बटालवी की लोकप्रियता सात समंदर पार कर चुकी थी। इंग्लैंड में उनके आने और छा जाने की खबरें सुर्ख़ियों और तस्वीरों के साथ छपीं। कविताओं के मंच सजे, निजी और सार्वजनिक समारोह हुए। महान चित्रकार सरदार शोभा की मौजूदगी इस साहित्यिक यात्रा का दुर्लभ संगम थी।
लंदन के पास कोवेंट्री में बटालवी के स्वागत में आयोजित पहले बड़े कार्यक्रम से लेकर रोचेस्टर और केंट के भव्य आयोजन, जहां भी बटालवी की कविता बही, शोभा सिंह की उपस्थिति ने माहौल को सांस्कृतिक अर्थों से भर दिया। यह सिर्फ़ एक चित्रकार की मौजूदगी नहीं, यह पंजाबी आत्मा का वह चेहरा था, जो शब्दों के साथ रंगों में भी सांस लेता है।
पंजाब की आत्मा के चित्रकार और बिरह के सम्राट
सरदार शोभा सिंह को यूं ही पंजाब की आत्मा का चित्रकार नहीं कहा जाता। सोहनी–माहीवाल, हीर–रांझा, और पंजाबी स्त्री के गरिमामय चेहरे, उनके कैनवास पर एक सभ्यता की स्मृतियां हैं। इंग्लैंड में आयोजित उन समारोहों में जब बटालवी की कविताएं गूंजती, शोभा सिंह की मौजूदगी याद दिलाती थी कि कविता और चित्रकला एक-दूसरे की परछाईं हैं।
बिरह के सम्राट शिव कुमार बटालवी के टूर के दौरान शोभा सिंह का इंग्लैंड में होना इस बात का संकेत था कि पंजाबी संस्कृति केवल शब्दों की विरासत नहीं, बल्कि दृश्य स्मृतियों की भी है। परदेस में बसे पंजाबी समुदाय के लिए यह एक भावुक क्षण था, जहां मातृभूमि की खुशबू कविता और रंग दोनों में महसूस हुई।
विरासत जो करती है प्रेरित
रोचेस्टर, केंट के आयोजन में जब मशहूर कलाकार शोभा सिंह मंच के आसपास दिखे, तो यह स्पष्ट हो गया कि यह यात्रा सिर्फ़ बटालवी की नहीं, बल्कि पंजाबी रचनात्मक चेतना की सामूहिक यात्रा थी। शोभा सिंह की शांत, गरिमामय उपस्थिति ने समारोहों को संतुलन दिया, जहां भावनाओं की तीव्रता के बीच कला की स्थिरता थी।
1972 की वह इंग्लैंड यात्रा आज इतिहास है, लेकिन उसके मायने आज भी ज़िंदा हैं। शोभा सिंह ने यह सिद्ध किया कि कलाकार जहां भी जाता है, अपनी मिट्टी साथ ले जाता है। शब्दों के बिना भी वह बहुत कुछ कह देता है। बटालवी की उस ऐतिहासिक यात्रा में चित्रकार शोभा सिंह की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्होंने पंजाबी पहचान को रंग दिए।
हिमाचल और देश-दुनिया की अपडेट के लिए join करें हिमाचल बिज़नेस
https://himachalbusiness.com/dr-rekha-thakur-of-kullu-becomes-himachal-pradeshs-first-dmi-certified-physiotherapist-creating-history-in-the-field-of-child-rehabilitation/
